Tuesday, 8 October 2019

Hindi Avyakt Vani 13/03/1969

13-03-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

प्रेम और शक्ति के गणों की समानता” 
आत्म-अभिमानी हो याद की यात्रा में बैठे होयाद की यात्रा में भी मुख्य किस गुण में स्थित होयाद की यात्रा में होते हुए भी मुख्य किस गुण स्वरूप होइस समय आप का मुख्य गुण कौन सा है? (सभी ने अपना-अपना विचार सुनाया) इस समय तो सभी विशेष प्रेम स्वरूप की स्थिति में हैं। लेकिन प्रेम के साथ-साथ वर्तमान समय की परिस्थितियों के प्रमाण जितना ही प्रेम स्वरूप उतना ही शक्ति स्वरूप भी होना चाहिए। देवियों के चित्र देखे हैं - देवियों के चित्र में मुख्य क्या विशेषता होती हैअपने चित्रों को कब ध्यान से देखा नहीं हैजब देवियों के चित्र बनाते हैं। काली के सिवाए बाकी जो भी देवियाँ हैं उन्हों के नयन हमेशा गीले दिखाते हैं। प्रेम में जैसे डूबे हुए नयन दिखाते हैं और साथ-साथ जो उनका चेहरा आदि बनाते हैं तो उनकी सूरत से ही शक्ति के संस्कार देखने में आते हैं। लेकिन नयनों में प्रेमदयाशीतलता देखने में आती है। मातापन के प्रेम के संस्कार इन नयनों से दिखाई पड़ते हैं। उन्हों के ठहरने का ढंग वा सवारी अस्त्र-शस्त्र दिखाते हैं, वह शक्ति रूप प्रगट करता है। तो ऐसे ही आप शक्तियों में भी दोनों गुण समान होने चाहिए। जितना शक्ति स्वरूप उतना ही प्रेम स्वरूप। अभी तक दोनों नहीं हैं। कभी प्रेम की लहर में कभी शक्ति रूप में स्थित रहते हो। दोनों ही साथ और समान रहे। यह है शक्तिपन की अन्तिम सम्पूर्णता की निशानी। अभी बापदादा को अपने बच्चों के मस्तक में क्या देखने में आता हैअपने मस्तक में देखा है क्या हैप्रारब्ध देखते हो वा वर्तमान सौभाग्य का सितारा चमकता हुआ देखते हो वा और कुछ? (हरेक ने अपना-अपना विचार सुनाया) तीनों सम्बन्धों से तीनों ही बातें देखने में आती हैं। इसीलिए आपको त्रिशूल सौगात भेजी थी। तीनों ही सितारे दिखाई दे रहे हैं। एक तो भविष्य कादूसरा वर्तमान सौभाग्य का और तीसरा जो परम- धाम में आपकी आत्मा की सम्पूर्ण अवस्था होनी हैवह आत्मा की सम्पूर्ण स्थिति का सितारा। तीनों ही सितारे दिखाई पड़ते हैं। इन तीनों सितारों को देखते रहना। कभी -कभी सितारों के बीच बादल आ जाते हैं। कभी-कभी सितारे जगह भी बदली करते हैं। कभी टूट भी पड़ते हैं। यहाँ भी ऐसे जगह भी बदली करते हैं। कभी टूट भी पड़ते हैं। कभी देखो तो बहुत ऊपरकभी देखो तो बीच मेंकभी देखो तो उससे भी नीचे। जगह भी अभी बदली नहीं करनी चाहिए। अगर बदली करो तो आगे भल बढ़ो। नीचे नहीं उतरो। अविनाशी सम्पूर्ण स्थिति में सदैव चढ़ते रहो। ऐसा सितारा बनना है। टूटने की तो यहाँ बात ही नहीं। सभी अच्छे पुरुषार्थी बैठे हुए हैं। बाकी जगह बदली की आदत को मिटाना है।
कुमारियों की रिजल्ट कैसी हैआप अपनी रिजल्ट क्या समझती होविशेष किस बात में उन्नति समझती हो? (हरेक ने अपना सुनाया) याद की यात्रा में कमी है। इसलिए इतनी महसूसता नहीं होती। अमृतवेले याद का इतना अनुभव नहीं होता है इसलिए जैसे साकार में यहाँ बाहर खुली हवा में सैर भी कराते थेलक्ष्य भी देते थेयोग का अनुभव भी कराते थे। इसी रीति जो कुमारियों के निमित्त टीचर्स हैं वह उन्हों को आधा घण्टा एकान्त में सैर करावे। जैसे शुरू में तुम अलग-अलग जाकर बैठते थेसागर के किनारेकोई कहाँकोई कहाँ जाकर बैठते थे। ऐसी प्रैक्टिस कराओ। छतें तो यहाँ बहुत बड़ी-बड़ी हैं। फिर शाम के समय भी 7 से 7:30 तक यह समय विशेष अच्छा होता है। जैसे अमृतवेले का सतोगुणी टाइम होता है वैसे यह शाम का टाइम भी सतोगुणी है। सैर पर भी इसी टाइम निकलते हैं। उसी समय संगठन में योग कराओ और बीच-बीच में अव्यक्त रूप से बोलते रहोकोई का बुद्धियोग यहाँ वहाँ होगा तो फिर अटेन्शन खैचेगा। योग की सबजेक्ट में बहुत कमी है। भाषण करनाप्रदर्शनी में समझाना यह तो आजकल के स्कूलों की कुमारियों को एक सप्ताह ट्रेनिंग दे दो तो बहुत अच्छा समझा लेंगी। लेकिन यह तो जीवन में अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करना है ना। उसी समय ऐसे समझो जैसे कि बापदादा के निमन्त्रण पर जा रहे हैं। जैसे बापदादा सैर करने आते हैं वैसे बुद्धियोग बल से तुम सैर कर सकती हो। जब याद की यात्रा का अनुभव करेंगे तो अव्यक्त स्थिति का प्रभाव आपके नयनों सेचलन से प्रत्यक्ष देखने में आयेगा। फिर उन्हों से माला बनवायेंगे। जैसे शुरू में आप खुद माला बनाती थी ना।
इस ग्रुप को उमंग उत्साह अच्छा है। बाकी एक बात खास ध्यान में रखनी है - कि एक दो के सस्कारों को जान करकेएक दो के स्नेह में एक दो से बिल्कुल मिल-जुल कर रहना है। जैसे कोई से विशेष स्नेह होता है तो उनसे कितना मिक्स हो जाते हैं। ऐसे ही सभी को एक दो में मिक्स होना चाहिए। जब कुमारियाँ ऐसा शो करके दिखायेंगी तब फिर और भी बुनमारियॉ सर्विस करने के निमित्त बनेगी। और जो निमित्त बनता है उनको उसका फल भी मिल जाता है। आप शोकेस हो अनेक कुमारियों को उमंग और उत्साहउन्नति में लाने की। जितना ही उमंग से साकार - निराकार दोनों ने मिलकर यह प्रोग्राम बनाया है उतना ही इसका उजूरा दिखाना है। कई कुमारियों की उन्नति के निमित्त बन सकती हो। अपनी हमजिन्स को गिरने से बचा सकती हो। बुनमारियों के साथ बापदादा का काफी स्नेह है। क्योंकि बापदादा परमपवित्र है और कुमारियाँ भी पवित्र है। तो पवित्रतापवित्रता को खींचती है। वर्तमान समय मुख्य विशेषता यही चाहिएहरेक महारथी का फर्ज है अपना गुण औरों में भरना। जैसे ज्ञान का दान देना होता है वैसे गुणों का भी दान करना चाहिए। जैसे ज्ञान रत्नों का दान करते हो इसलिए महारथी कहलाये जाते होवैसे गुणों का दान भी बहुत बड़ा दान है। ज्ञान देना तो सहज है। गुणों का दान देनाइसमें जरा मेहनत है। गुणों का दान करने में - सभी महारथियों से नम्बरबन कौन हैजनक। यह गुण उसमें विशेष है। तो एक दो से यह गुण उठाना चाहिए।
(आबू म्यूजियम की तैयारी के बारे में बापदादा ने पूछा)
दूरादेशी और विशाल बुद्धि बन म्युजियम तैयार करना है। पहले ही भविष्य को सोच समय को सफल करने का गुण धारण करना है और टाइम पर तैयार भी करना है। जल्दी भी हो और सम्पूर्ण भी हो तो कमाल है। अगर कोई भी कमी रही तो उस कमी की तरफ सभी की नजर जायेगी। ऐसी कमी न हो। सभी के मुख से कमाल हैऐसा निकलना चाहिए। सारा दैवी परिवार आपका चेहरा म्युजियम के दर्पण में देखेंगे।
अच्छा !!!

Hindi Avyakt Vani 04/03/1969

04-03-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

होली के शुभ अवसर
आज आपकी खास होली है क्याहोली कैसे मनाई जाती हैहोली मनाने आती हैकाम की होली कौन सी हैवर्तमान पार्ट अनुसार होली कैसे मनायेंगेवर्तमान समय कौन सी होली मनाने की आवश्यकता हैहोली में कई बातें करनी होती है। लग भी जाता है। जलाया भी जाता है और साथ-साथ श्रृंगारा भी जाता है। और कुछ मिटाना भी होता है। जो भी बातें होली में करनी है वह सभी इस समय चल रही है। जलाना क्या हैमिटाना क्या हैरंगना क्या है और श्रृंगारना क्या हैयह सभी कर लेना इसको कहा जाता है मनाना। अगर इन चारों बातों में से कुछ कमी है तो मनाना नहीं कहेंगे। होली के दिनों में बहुत सुन्दर सजते हैं। कैसे सजते हैंदेव- ताओं के समान। आप सभी सजे हुए हैंसजावट में कोई कमी तो नहीं है। सजावट में मुख्य होली का श्रृंगार कौनसा होता हैसांग जो बनाते हैं उन्हों को पहले-पहले मस्तक में बल्ब लगाते हैं। यह भी इस समय की कॉपी की हुई है। आप का भी काम का मुख्य श्रृंगार है मस्तक पर आत्मा का दीपक जलाना। इसकी निशानी बल्व जलाते हैं। लेकिन यह सभी बातें होने लिए होली का अर्थ याद रखना है। ' 'होली '' जो कुछ हुआ वह हो गया। हो लिया। जो सीन हुई होली अर्थात् बीत चुकी। वर्तमान समय जो प्याइन्ट ध्यान में रखनी है वह है यह होली की अर्थात् ड्रामा के ढाल की। जब ऐसे मजबूत होंगे तब वह रंग भी पक्का लग सकेगा। अगर होली का अर्थ जीवन में नहीं लायेंगे तो रंग कच्चा हो जाता है। पक्का रंग खाने के लिए हर वक्त सोचो हो ली। जो बीता हो ही गया। ऐसी होली मना रहे होवा कभी-कभी ड्रामा की सीन देखकर कुछ मंथन चलता है। ज्ञान का मंथन दूसरी बात है। लेकिन ड्रामा की सीन पर मंथन करना क्योंक्याकैसे। वह किस चीज का मंथन किया जाता। दही को जब मंथन किया जाता है तब मक्खन निकलता है। अगर पानी को मंथन करेंगे तो क्या निकलेगाकुछ भी नहीं। रिजल्ट में यही होगा एक तो थकावटदूसरा टाइम वेस्ट। इसलिए यह हुआ पानी का मंथन। ऐसा मंथन करने के बजाये ज्ञान का मंथन करना है। साकार रूप में लास्ट दिनों में सर्विस की मुख्य युक्ति कौन सी सुनाई थी? ' 'घेराव डालना' ' डबल घेराव डालना है एक तो वाणी द्वारा सर्विस का दूसरा- अव्यक्त आकर्षण का। यह ऐसा घराव डालना है जो खुद न उससे निकल सकेंन दूसरे निकल सकें। घेराव डालने का ढंग अभी तक प्रैक्टिकल में दिखाया नहीं है। म्युजियम बनाना तो सहज है। म्युजियम बनाना यह कोई घेराव डालना नहीं है। लेकिन अपने अव्यक्त आकर्षण से उन्हों को घायल करना यह है घेराव डालना। वह अभी चल रहा है। अभी सर्विस का समय भी ज्यादा नहीं मिलेगा। समस्यायें ऐसी खड़ी हो जाएँगी जो आपके सर्विस में भी बाधा पड़ने की सम्भावना होगी। इसलिए जो समय मिल रहा है उसमें जिसको जितनी सर्विस करनी है वह अधिक से अधिक कर लें। नहीं तो सर्विस का समय भी होली हो जायेगा। यानी बीत जायेगा। इसलिए अब अपने को आपे ही ज्यादा में ज्यादा सर्विस के बन्धन में बांधना चाहिए। इस एक बन्धन से ही अनेक बन्धन मिट जाते हैं। अपने को खुद ईश्वरीय सेवा में लगाना चाहिए औरों के कहने से नहीं। औरों के कहने से क्या होगाआधा फल मिलेगा। क्योंकि जिसने कहा अथवा प्रेरणा दी उनकी भाईवारी हो जाती है। दुकान में अगर दो भाईवार (साझीदार) हो तो बंटवारा हो जाता है ना! एक है तो वह मालिक हो रहता है। इसलिए अगर किसके कहने से करते हैं तो उस कार्य में भाईवारी हो जाती है। और स्वयं ही मालिक बन करके करते हैं तो सारी मिलकियत के अधिकारी बन जाते हैं। इसलिए हरेक को मालिक बनकर करना है लेकिन मालिकपने के साथ-साथ बालकपन भी पूरा होना चाहिए। कहाँ-कहाँ मालिक बनकर खड़े हो जाते हैंकहाँ फिर बालक होकर छोड़ देते हैं। तो न छोड़ना है न पकड़ना है। पकड़ना अर्थात् जिद से नहीं पकड़ना है। कोई चीज को अगर बहुत जोर से पकड़ा जाता है तो उस चीज का रूप बदल जाता है ना। फूल को जोर से पकड़ों तो क्या हाल होगा। पकड़ना तो है लेकिन कहाँ तककैसे पकड़ना हैयह भी समझना है। या तो पकड़ते अटक जाते हैं वा छोड़ते हैं तो छूट जाते हैं। दोनों ही समान रहे यह पुरुषार्थ करना है। जो मालिक और बालक दोनों रीति से चलने वाला होगा उनकी मुख्य परख यह होगी - एक तो निर्माणता होगी उसके साथ निरहंकारीनिर्माण और साथ-साथ प्रेम स्वरूप। यह चारों ही बातें उनके हर चलन से देखने में आएँगी। अगर चारों में से कोई भी कम है तो कुछ स्टेज की कमी है। अच्छा-
वतन में आज होली कैसे खेली मालूम हैसिर्फ बच्चों के साथ ही थे। आप भी होली मना रहे हो ना! वहाँ सन्देशी आई तो एक खेल किया। कौन सा खेल किया होगा? (आप ले चलो तो देखे) बुद्धि का विमान तो है। बुद्धि का विमान तो दिव्य दृष्टि से भी अच्छा है। यहाँ तो वह हो ही नहीं सकता। वह चीज ही नहीं। आज सुहेजों का दिन था ना! तो जब सन्देशियॉ वतन में आई तो साकार को छिपा दिया। एक बहुत सुन्दर फूलों की पहाड़ी बनाई थी उनके अन्दर साकार को छिपाया हुआ था। दूर से देखने में तो पहाड़ी ही नजर आती थी। तो जब सदेशी आई तो साकार को देखा नहीं। बहुत ढूढा देखने में ही नहीं आया। फिर अचानक ही जैसे छिपने का खेल करते हैं ना! ऐसा खेल देखा। फूलों के बीच साकार बैठा हुआ नजर आया। वह सीन बड़ी अच्छी थी। 
अव्यक्त बापदादा हरेक को अमृत कर भोग दे रहे थे और एकएक से मुलाकात भी कर रहे थे। खास म्युजियम वालों को डायरेक्शन दे रहे थे अव्यक्ति आकर्षण से म्युजियम ऐसा बनाओ जो कोई भी अन्दर आयेदेखे तो एकदम आकर्षित हो जाये।
अच्छा !!!

Hindi Avyakt Vani 15/02/1969

15-02-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

"शिवरात्रि के अवसर पर अव्यक्त बापदादा के महावाक्य"
(सन्तरी दादी के तन द्वारा)
आज किसके स्वागत का दिन है? (बाप और बच्चों का) परन्तु कई बच्चे अपने को भी भूले हुए हैं तो बाप को भी भुला दिया है। आज कि दिन वह स्वागत है जैसे पहले होती थीकितनी तारें आती थी! तो भूला ना। बाप जब है ही तो फिर भुलाना कहाँ तक! यह है निश्चययह है पढ़ाई। जब पढ़ाई कायम है तो वह कार्य भी जैसा का वैसा चलता रहेगा। वह निश्चय नहीं तो कार्य में भी जरा बच्चे अपने मर्तबे को समझते हैं कि मैं किसका बच्चा हूँबाप सदा है तो बच्चे भी सदा है। परन्तु देह अभिमान अपने स्वधर्म को भुला देता है। भूलने से कार्य कैसे चलेगा। आगे कैसे बढ़ेंगेजबकि बाप ने अपना परिचय दिया हैबच्चों को भी अपना परिचय मिला हुआ है। कितना समय से इसी लक्ष्य को पक्का कराने के लिए मेहनत की गई हैउस मेहनत का फल कहाँ तकसिर्फ याद कराने के लिए यह कह रहा हूँमुरली तो चलानी नहीं है। सिर्फ बच्चों से मिलने आया हूँ। बच्ची ने कहा बहुत याद कर रहे हैंबाबा आप चलेंगे तो रिफ्रेश करेंगे। रिफ्रेश तो हो ही - अगर निश्चय है तो। फिर भी बच्चों से मिलने के लिए आना पड़ाथोड़े समय के लिए। स्वमान की स्मृति दिलाने के लिए आये हैं। बच्चेसदैव अपने को सौभाग्यशाली समझें। सदा सौभाग्यशाली उनको कहा जाता है जिनका बापटीचर और सतगुरू से पूरा कनेक्शनपूरी लगन है।
कन्या की सगाई के बाद क्या होता हैपति के साथ लगन लग जाती है। तब उनको कहते हैं सदा सुहागिन। परन्तु वह कहाँ तक सुहागिन हैअन्दर में क्या भरा पड़ा है! कन्या सौ ब्राह्माणों से उत्तम गिनी जाती है। सगाई करने के बाद अशुद्ध बनने कारण आन्तरिक अभागिन है। यह किसको भी पता नहीं है। बाप ही बतलाते हैं सदा सुहागिन कौन है। सदा के लिए परमात्मा से पूरी लगन रहेवो सदा सुहागिन है।
यह तो अभी पढ़ाई का समय हैबाप अपना कर्तव्य कर रहे हैंडायरेक्शन देते पढ़ाते हैं। जब तक पढ़ाना हैपढ़ाते रहेंगे। विनाश सामने खड़ा हैउसका कनेक्शन बाप के साथ है। ऐसे मत समझो बाप की जुदाई है। जुदाई भी नहीं विदाई भी नहीं। जब तक विनाश नहीं तब तक बाप साथ है। वतन में बाप गया है कोई कार्य के लिए। समय अनुसार वह सब कुछ होता रहेगा। इसमें न कोई विदाई हैन जुदाईजुदाई लगती हैतुमने विदाई दी थीअगर विदाई दी होगी तो जुदाई भी होगी। विदाई नहीं दी होगी तो जुदाई भी नहीं होगी। यह ड्रामा के अन्दर पार्ट चलता रहता है। बाप का खेल चल रहा है। खेल में खेल चलता रहेगा। आगे तो बहुत ही खेल देखने हैं। इतनी हिम्मत हैजब हिम्मत रखेंगे तब बहुत देखेंगे। आगे बहुत कुछ देखना है। परन्तु कदम को सम्भाल-सम्भाल कर चलाना है। अगर सम्भल कर नहीं चलेंगे तो कहाँ खड्डा भी आ जायेगा। एक्सीडेंट भी हो पड़ेंगे। बच्चों से मिलने के लिए थोड़े समय के लिए आया हूँ। बहुत कार्य करना है। वतन से बहुत कुछ करना पड़ता है। बच्चों की भी दिल पूरी करनी पड़ती है तो भक्तों की भी दिल पूरी करनी पड़ती है। सभी कार्य काम पर ही होते हैं। बाप का परिचय मिला ,खज़ानालाटरी मिली। अभी बच्चों की सर्विस पूरी की। वतन से अभी सबकी करनी है। बच्चे सगे भी हैं तो लगे भी हैं। सर्विस तो सबकी करनी है। सवेरे भी आकर दृष्टि से परिचय दे दिया। दृष्टि द्वारा सर्चलाइट दे सभी को सुख देना बाप का कर्तव्य है। अभी तो सभी को म्यूजियम की सर्विस करनी है। सबको बाप का परिचय देना है। बाप ने जो सर्विस के चित्र बनवाये हैंउस पर सर्विस करनी है। अंगुली देने से पहाड़ उठता है ना। यही गायन है गोप गोपियों ने अंगुली से पहाड़ उठाया। अंगुली नहीं देंगे तो पहाड़ नहीं उठेगा। सृष्टि पर आत्माओं का उद्धार करवह पहाड़ उठाकर फिर साथ ले जाना है। समूह होता है ना। अन्त में समूह बनकर सभी के साथ रहना है। पहले-पहले साक्षात्कार में लाल-लाल समूह देखा था तब तो समझ में नहीं आया परन्तु अब वही आत्माओं का समूह हैजिनको साथ ले जाने का ड्रामा के अन्दर प्रोग्राम है। सभी की सर्विस करनी है। अच्छा
सवेरे उठकर बाप की याद में रहोक्योंकि उस समय बाप सभी को याद करते हैं। उस समय कोई-कोई बच्चे दिखाई नहीं पड़ते हैं। ढूढना पड़ता है। भल अकेले रीति याद करते हैंपरन्तु संगठन के साथ भी जरूर चलना है। जितना याद में रहेंगे उतना ही बाप के नजदीक होते जायेंगे। बाप को भुलाने से मूंझते है। बाप को सदैव साथ रखेंगे तो भूल नहीं सकते।

Hindi Avyakt Vani 06/02/1969

06-02-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"महिमा सुनना छोड़ो – महान बनों"
सभी याद की यात्रा में बैठे होपढ़ाई का सार तो समझ में आ गया। उस सार को जीवन में लाकर के दुनिया को वह राज सुनाना है। रचयिता और रचना की नालेज को तो समझ गये हो। सुना तो बहुत है लेकिन अब जो सुना है वह स्वरूप बनके सभी को दिखाना है। कैसे दिखायेंगेआपकी हर चलन से बाप और दादा के चरित्र नजर आवे। आपकी आँखों में उस ही बाप को देखें। आपकी वाणी से उन्हीं की नालेज को सुनें। हर चलन मेंहर चरित्र समाया हुआ होना चाहिए। सिर्फ बाप के चरित्र नहीं लेकिन बाप के चरित्र देख बच्चे भी चरित्रवान बन जायें। आपके चित्र में उसी अलौकिक चित्र को देखें। आप के व्यक्त रूप में अव्यक्त मूर्त नजर आवे। ऐसा पुरूषार्थ करकेजो बापदादा ने मेहनत की है उसका फल स्वरूप दिखाना है। जैसे अज्ञान काल में भी कोई-कोई बच्चों में जैसे कि बाप ही नजर आता है। उनके बोल-चाल से अनुभव होता है जैसे कि बाप है। इसी रीति से जो अनन्य बच्चे हैं उन एक एक बच्चे द्वारा बाप के गुण प्रत्यक्ष होने चाहिए और होंगे। कैसे होंगेउसका मुख्य प्रयत्न क्या हैमुख्य बात यही है जो साकार रूप से भी सुनाया है कि याद की यात्राअव्यक्त स्थिति में स्थित होकर हर कर्म करना है। अब तो बच्चों को बहुत सामना करना है। लेकिन समर्थ साथ है इसलिए कोई मुश्किल नहीं है। सिर्फ एक बात सभी को ध्यान में रखनी है कि सामना करने के लिए बीच में रूकावट भी आयेगी। सामना करने में रूकावट कौन सी आयेगीमालूम है? (देह अभिमान) देह अभिमान तो एक मूल बात है लेकिन सामना करने के लिए बीच में कामना विघ्न डालेगी। कौन सी कामनामेरा नाम होमैं ऐसा हूँमेरे से राय क्यों नहीं लीमेरा मूल्य क्यों नहीं रखायह अनेक प्रकार की कामनायें सामना करने में विघ्न रूप में आयेगी। यह याद रखना है हमको कोई कामना नहीं करनी है। सामना करना है। अगर कोई कामना की तो सामना नहीं कर सकेंगेऔर अव्यक्त स्थिति में महान बनने के लिए एक बात जो कहते रहते हैं - वह धारण कर ली तो बहुत जल्दी और सहज अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जायेंगे। वह कौन-सी बातहम अभी मेहमान है। क्योंकि आप सभी को भी वाया सूक्ष्मवतन होकर घर चलना है। हम मेहमान हैं ऐसा समझने से महान् स्थिति में स्थित हो जायेंगे। मेहमान के बजाए जरा भी एक शब्द में अन्तर कर लिया तो गिरावट भी आ जायेगी। वह कौन सा शब्दमेहमान समझना है लेकिन महिमा में नहीं आना है। अगर महिमा में आ गये तो मेहमान नहीं बनेंगे। मेहमान समझेंगे तो महान् बनेंगे। है जरा सा अन्तर। मेहमान और महिमा। लेकिन जरा सा अन्तर भी अवस्था को बहुत नीचे ऊपर कर देता है।
तुम सभी को ज्ञान कौनसा देते होत्रिमूर्ति का। जैसे त्रिमूर्ति का ज्ञान औरों को देते हो वैसे अपने पास भी तीन बातों का ज्ञान रखना है। तीन बातें छोड़ो और तीन बातें धारण करो। अब यह तीन बातें छोड़ेंगे तब ही स्वरूप में स्थित होंगे। सर्विस में सफलता भी होगी। बताओ कौन सी तीन बातें छोड़नी हैजो सर्विस में विघ्न डालती हैवह छोड़नी है। एक तो-कभी भी कोई बहाना नहीं देना। दूसरा कभी भी किससे सर्विस के लिए कहलाना नहीं। तीसरा - सर्विस करते कभी मुरझाना नहीं। बहानाकहलाना और मुरझाना यह तीन बातें छोड़नी है। और फिर कौनसी तीन बातें धारण करनी हैंत्यागतपस्वा और सेवा। यह तीन बातें धारणा में चाहिए। तपस्वा अर्थात् याद की यात्रा और सर्विस के बिना भी जीवन नहीं बन सकती। इन दोनों बातों की सफलता त्याग के बिना नहीं हो सकती। इसलिए तीन बातें छोड़नी है और तीन बातें धारण करनी है। अगर इन तीनों बातों की धारणा हुई तो क्या बन जायेंगेजो आपका गायन है ना वही स्वरूप बन जायेंगे। यहाँ आबू में भी आपका गायन है किस रूप में और कौन सा रूप यादगार का हैतपस्या के साथ-साथ और भी कोई मुख्य रूप का यादगार हैजिन्होंने देलवाड़ा मन्दिर ध्यान से देखा होगा उन्हें याद होगा। जैसे तपस्वी हैंतो त्रिनेत्री भी हैं। तपस्वा के साथ-साथ याद त्रिमूर्ति की है। तो जैसा यादगार है त्रिनेत्री काऐसा बनना है। तीसरा नेत्र कौन सा हैज्ञान का। ज्ञान का तीसरा नेत्र ही यादगार के रूप में दिखाया है। तपस्वी और त्रिनेत्री। तीसरा नेत्र कायम होगा तब ही तपस्वी बन सकेंगे। अगर ज्ञान का नेत्र गायब हो जाता है तो तपस्या भी नहीं रह सकती। इसलिए अब त्रिमूर्ति शब्द को भी याद करके धारणा में चलेंगे तो वह बन जायेंगे। जो शक्तियों का गायन हैजो प्रभाव है वह देखने में आयेगा। अभी गुप्त है। अभी तक शक्तियाँ गुप्त क्यों हैंक्योंकि अभी तक अपने स्वमानअपनी सर्विस और अपनी श्रेष्ठतायें अपने से ही गुप्त हैं। अपने से ही गुप्त होने कारण सृष्टि से भी गुप्त हैं। जब अपने में प्रत्यक्षता आयेगी तब सृष्टि में भी प्रत्यक्षता होगी।
अभी शिवरात्रि का जो पर्व आ रहा है उनको और भी धूमधाम से मनाना है। बड़े उमंग और हुल्लास से परिचय देना है। क्योंकि बाप के परिचय में बच्चों का परिचय भी आ जाता हे। बच्चे बाप का परिचय देंगे तो बाप फिर अव्यक्त में बच्चों का परिचयबच्चों का साक्षात्कार आत्माओं को कराते रहेंगे। तो इस शिवरात्रि पर कुछ नवीनता करके दिखाना है। क्या नवीनता करेंगेअब तक जो भाषण किये हैं वह यथा योग यथाशक्ति तो करते रहते हो लेकिन अब खास शक्ति रूप से भाषण करने हैं। शक्ति रूप का भाषण क्या होता हैललकार करना। क्या ललकार करेंगेऔर ही जोर-शोर से समय की पहचान दो। और उन्हों को बार-बार सुनाओ कि यह बाप का कर्तव्य अब जास्ती समय नहीं है। कुछ तो हाथ से गंवा दिया लेकिन जो कुछ थोड़ा समय रहा हैउनको भी गंवा न दो। ऐसे फोर्स से समय की पहचान दो। जैसे आजकल साइंस वाले ऐसे-ऐसे बाम्बस बना रहे हैं जो अपने स्थान पर बैठे हुए भी जहाँ बम लगाना होगा वहाँ का निशाना दूर बैठे भी कर सकते हैं। तो साइंस की शक्ति से तो श्रेष्ठ साइलेन्स है। जैसे वह साइंस के गोले बनाते हैं - वैसे अब शक्तियों को साइलेन्स की शक्ति से गोले फेंकने हैं। शुरू-शुरू में शक्तियों की ललकार ही चलती थी। अभी शुरू जैसे ललकार नहीं है। अभी विस्तार में पड़ गये हैं। विस्तार में पड़ने से ललकार का रूप गुप्त हो गया है। अभी फिर से बीजरूप अवस्था में स्थित होकर ललकार करो। उस ललकार से कईयों में बीज पड़ सकता है। लेकिन बीजरूप स्थिति में स्थिति रहेंगे तो अनेक आत्माओं में समय की पहचान और बाप की पहचान का बीज पड़ेगा। अगर बीजरूप स्थिति में स्थित न रहे सिर्फ विस्तार में चले गये तो क्या होगाज्यादा विस्तार से भी वैल्यु नहीं रहेगी। व्यर्थ हो जायेगा। इसलिए बीजरूप स्थिति में स्थित हो बीजरूप की याद में स्थित हो फिर बीज डालो। फिर देखना यह बीज का फल कितना अच्छा और सहज निकलता है। अभी तक मेहनत जास्ती की है प्रत्यक्षफल कम है। अभी मेहनत कम करो प्रत्यक्षफल ज्यादा दिखाओ। स्नेह तो सभी का है ही लेकिन स्नेह का स्वरूप भी कुछ दिखाना है। यूँ तो सदैव इस स्थिति में रहना चाहिए लेकिन खास शिवरात्रि तक हरेक बच्चे को ऐसा समझना चाहिए जैसे शुरू में आप बच्चों की भट्टी के प्रोग्राम चलते थेइसी रीति से हरेक को समझना चाहिए शिवरात्रि तक हमको याद की यात्रा की भट्टी में ही रहना है। बिल्कुल अव्यक्त स्थिति में स्थित रहने काअपनी चेकिंग करने का ध्यान रखो। फिर इस अव्यक्त स्थिति का कितना प्रभाव निकलता है। मुश्किल नहीं है। बहुत सहज है। कारोबार में आते हुए भी भट्टी चल सकती है। यह तो आन्तरिक स्थिति है। आन्तरिक स्थिति का प्रभाव जास्ती पड़ता है।
सभी अमृतवेले मुलाकात करते होअभी तक ऐसा वायुमण्डल नहीं पहुँचा है। अब तक मधुबन वालों ने भी स्नेह का सबूत नहीं दिया है। चारों ओर से बहुत कम बच्चे हैं जिन्होंने स्नेह का सबूत दिया है। बाप का बच्चों से कितना स्नेह था। स्नेह का सबूत प्रैक्टिकल में कितना समय दिया। क्या दिया थायाद हैखास अपनी तबियत को भी न देखकर क्या सबूत दिया थाअपनी शारीरिक स्थिति को न देखते भी कितना समय खास सर्च लाईट देते थे। कितना समय स्नेह का सबूत दिया। आप कहते थे शरीर पर इफेक्ट आता है लेकिन बाबा ने अपने शरीर को देखायह स्नेह का सबूत था। अब बच्चों को भी रिटर्न में स्नेह का सबूत देना है। जो कर्म करके दिखाया वही करना है। अमृतवेले जैसे साकार रूप में करके दिखाया वैसे ही बच्चों को करना चाहिए। नहीं तो अब तक यही रिजल्ट देखी हैइस बात में अपने दिल को खुश कर लेते हैं। उठे और बैठे। लेकिन वह रूहाबशक्ति स्वरूप की स्मृति नहीं रहती। शक्ति रूप के बदले क्या मिक्स हो गया हैसुस्ती। तो सुस्ती मिक्स होने से मुलाकात करते हैं लेकिन लाइन क्लीयर नहीं होती है इसलिए मुलाकात से जो अनुभव होना चाहिए वह नहीं कर पाते हैं। मिक्स-चर है। यहाँ शुरू करेंगे तो मधुबन-वासियों को देख सब करेंगे। मधुबन निवासी जो खास स्नेही हैं उनको खास सैक्रीफाइज (बलिदान) करना है। स्नेह में हमेशा सेक्रीफाइज किया जाता है।
अच्छा - ओम् शान्ति।

Hindi Avyakt Vani 02/02/1969

02-02-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"अव्यक्त मिलन के अनुभव की विधि"
प्रेम स्वरूप बच्चेज्ञान सहित प्रेम जो होता है वही यथार्थ प्रेम होता है। आप सभी का प्रेमरस बापदादा को भी खींच लाता है। सभी बच्चों के दिल के अन्दर एक आशा दिखाई दे रही है। वह कौन सीकई बच्चों ने सन्देश भेजा कि आप हमें भी अपने अव्यक्त वतन का अनुभव कराओ। यह सभी बच्चों की आशायें अब पूर्ण होने का समय पहुँच ही गया है। आप कहेंगे कि सभी सन्देशी बन जायेंगे। लेकिन नहीं। अव्यक्त वतन का अनुभव भी बच्चे करेंगे। लेकिन दिव्य- बुद्धि के आधार पर जो अब अलौकिक अनुभव कर सकते हो वह दिव्य दृष्टि द्वारा करने से भी बहुत लाभदायकअलौकिक और अनोखा है। इसलिए जो भी बच्चे चाहते हैं कि अव्यक्त बाप से मुलाकात करेंवह कर सकते हैं। कैसे कर सकते हैंइसका तरीका सिर्फ यही है कि अमृत- वेले याद में बैठो और यही संकल्प रखो कि अब हम अव्यक्त बापदादा से मुलाकात करें। जैसे साकार में मिलने का समय मालूम होता था तो नींद नहीं आती थी और समय से पहले ही बुद्धि द्वारा इसी अनुभव में रहते थे। वैसे अब भी अव्यक्त मिलन का अनुभव प्राप्त करना चाहते हो तो उसका बहुत सहज तरीका यह है। अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर रूह-रूहान करो। तो अनु- भव करेंगे कि सचमुच बाप के साथ बातचीत कर रहे हैं। और इसी रूह-रूहान में जैसे सन्दे- शियों को कई दृश्य दिखाते हैं वैसे ही बहुत गुह्यगोपनीय रहस्य बुद्धियोग से अनुभव करेंगे। लेकिन एक बात यह अनुभव करने के लिए आवश्यक है। वह कौनसीमालूम हैअमृतवेले भी अव्वक्त स्थिति में वही स्थित हो सकेंगे जो सारा दिन अव्यक्त स्थिति में और अन्तर्मुख स्थिति में स्थित होंगे। वही अमृतवेले यह अनुभव कर सकेंगे। इसलिए अगर स्नेह है और मिलने की आशा है तो यह तरीका बहुत सहज है। करने वाले कर सकते हैं और मुलाकात का अनोखा अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।
वतन में बैठे-बैठे कई बच्चों के दिलों की आवाज पहुँचती रहती है। आप सोचते होंगे - शिव- बाबा बहुत कठोर है लेकिन जो होता है उसमें रहस्य और कल्याण है। इसलिए जो आवाज पहुँ- चती है वह सुनकर के हर्षाता रहता हूँ। क्या बापदादा निर्मोही हैआप सभी बच्चे निर्मोही होनिर्मोही बने होतो बापदादा निर्मोही और बच्चों में शुद्ध मोह तो मिलन कैसे होगा। बापदादा में शुद्ध मोह है? (साकार बाबा का बच्चों में शुद्ध प्यार था) शिवबाबा का नहीं हैबापदादा का है? (जैसा हमारा है वैसा नहीं) शुद्ध मोह बच्चों से भी जास्ती है। लेकिन बापदादा और बच्चों में एक अन्तर है। वह शुद्ध मोह में आते हुए भी निर्मोही हैं और बच्चे शुद्ध मोह में आते हैं तो कुछ स्वरूप बन जाते हैं। या तो प्यारे बनते या तो न्यारे बनते। लेकिन बापदादा न्यारे और प्यारे साथ-साथ बनते हैं। यह अन्तर जो रहा हुआ है इसको जब मिटायेंगे तो क्या बनेंगेअन्तर्मुखअव्यक्तअलौकिक। अभी कुछ कुछ लौकिकपन भी मिल जाता है। लेकिन जब यह अन्तर खत्म कर देंगे तो बिल्कुल अलौकिक और अन्तर्मुखीअव्यक्त फरिश्ते नजर आयेंगे। इस साकार वतन में रहते हुए भी फरिश्ते बन सकते हो। आप फिर कहेंगे आप वतन में जाकर फरिश्ता क्यों बनेंयहाँ ही बनते। लेकिन नहीं। जो बच्चों का काम वह बच्चों को साजे। जो बाप का कार्य है वह बाप ही करते हैं। बच्चों को अब पढ़ाई का शो दिखाना है। टीचर को पढ़ाई का शो नहीं दिखना हैटीचर को पढ़ाई पढ़ानी होती है। स्टूडेन्ट को पढ़ाई का शो दिखाना होता है। शो केस में शक्तियों को पाण्डवों को आना है। बापदादा तो है ही गुप्त।
अभी सभी के दिल में यही संकल्प है कि अब जल्दी-जल्दी ड्रामा की सीन चलकर खत्म हो लेकिन जल्दी होगीहो सकती हैहोगी या हो सकती हैभावी जो बनी हुई हैवह तो बनी हुई बनी ही रहेगी। लेकिन बनी हुई भावी में यह इतना नजर आता है कि अगर कल्प पहले माफिक संकल्प आता है तो संकल्प के साथ-साथ अवश्य पहले भी पुरूषार्थ तीव्र किया होगा। तो यह भी संकल्प आता है कि ड्रामा का सीन जल्दी पूरा कर सभी अव्यक्तवतन वासी बन जायें। बनना तो है। लेकिन आप बच्चों में इतनी शक्ति है जो अव्यक्त वतन को भी व्यक्त में खींचकर ला सकते हो। अव्यक्त वतन का नक्शा व्यक्त वतन में बना सकते हो। आशायें तो हरेक की बहुत हैं। ऐसे ही पहुँचती हैं जैसे इस साकार दुनिया में बहुत बड़ी आफिस होती है टेलीफोन और टेलीग्राफ कीवैसे ही बहुत शुद्ध संकल्पों की तारे वतन में पहुँचती रहती हैं। अभी क्या करना हैकई बच्चों के कुछ लोक संग्रह प्रति प्रश्न भी हैं वह भी पहुँचते हैं। कई बच्चे मूंझते हैं कि साकार द्वारा तो यह कहा कि सूक्ष्मवतन है ही नहींतो बाबा कहाँ गयेकहाँ से मिलने आते हैंकहाँ यह सन्देश भेजते हैंक्यों भोग लगाते होइसका भी राज है। क्यों कहा गया थाइसका मूल कारण यही है कि जैसे आप लोगों ने देखा होगा कि कभी-कभी छोटे बच्चे जब कोई चीज के पीछे लग जाते हैं तो वह चीज भल अच्छी भी होती है लेकिन हद से ज्यादा उस अच्छी चीज के पीछे पड़ जाते हैं तो बच्चों से क्या किया जाता हैवह चीज उनकी आँखों से छिपाकर यह कहा जाता है कि है ही नहीं। इसलिए ही कहा जाता है कि इसकी जो एकस्ट्रा लगन लग गई हैवह कुछ ठीक हो जाए। इसी रीति से वर्तमान समय कई बच्चे इन्ही बातों में कुछ चटक गये थे। तो उनको छुड़ाने के लिए साकार में कहते थे कि यह सूक्ष्मवतन है ही नहीं। तो यह भी बच्चों की इस बात से बुद्धि हटाने के लिए कहा गया था। लेकिन इसका भाव यह नहीं है कि अगर बच्चों से चीज छिपाई जाती है तो वह चीज खत्म हो जाती है। नहीं। यह एक युक्ति हैचटकी हुई चीज से छुड़ाने की। तो यह भी युक्ति की। अगर सूक्ष्मवतन नहीं तो भोग कहाँ लगाते होइस रसम रिवाज को कायम क्यों रखाकोई भी ऐसा कार्य होता है तो खुद भी सन्देश क्यों पुछवाते थेतो ऐसे भी नहीं कि सूक्ष्मवतन नहीं है। सूक्ष्मवतन है। लेकिन अब सूक्ष्मवतन में आने जाने के बजाए स्वयं ही सूक्ष्मवतन वासी बनना है। यही बापदादा की बच्चों में आशा है। आना-जाना ज्यादा नहीं होना चाहिए। यह यथार्थ है। कमाई किसमें हैतो बाप बच्चों की कमाई को देखते हैं और कमाई के लायक बनाते हैं। इसलिए यह सभी रहस्य बोलते रहे। अभी समझा कि क्यों कहा था और अब क्या हैसूक्ष्मवतन के अव्यक्त अनुभव को अनुभव करो। सूक्ष्म स्थिति को अनुभव करो। आने जाने की आशा अल्पकाल की है। अल्पकाल के बजाए सदा अपने को सूक्ष्मवतनवासी क्यों नहीं बनातेऔर सूक्ष्मवतनवासी बनने से ही बहुत वण्डरफुल अनुभव करेंगे। खुद आप लोग वर्णन करेंगे कि यह अनुभव और सन्देशियों के अनु- भव में कितना फर्क हैवह कमाई नहीं। यह कमाई भी है और अनुभव भी। तो एक ही समय दो प्राप्ति हो वह अच्छा या एक ही चाहते होऔर कई बच्चों के मन में यह भी प्रश्न है कि ना मालूम जो बापदादा कहते थे कि सभी को साथ में ले जायेंगेअब वह तो चले गये। लेकिन वह चले गये हैंमुक्तिधाम में जा नहीं सकते - सिवाए बारात वा बच्चों के। बारात के बिगर अकेले जा सकते हैंबारात तैयार हैयही सुना है अब तक कि बारात के साथ ही जायेंगे। जब बारात ही सज रही है तो अकेले कैसे जायेंगे। अभी तो सूक्ष्मवतन में ही अव्यक्त रूप से स्थापना का कार्य चलता रहेगा। जब तक स्थापना का कार्य समाप्त नहीं हुआ है तब तक बिना कार्य सफल किये हुए घर नहीं लौटेंगेसाथ ही चलेंगे और फिर चलने के बाद क्या करेंगेमालूम है - क्या करेंगेसाथ चलेंगे और साथ रहेंगे। और फिर साथ-साथ ही सृष्टि पर आयेंगे। आप बच्चों का जो गीत है कभी भी हाथ और साथ न छूटेतो बच्चों का भी वायदा है तो बाप का भी वायदा है। बाप अपने वायदे से बदल नहीं सकते। और भी कोई प्रश्न हैयूँ तो समय प्रति समय सब स्पष्ट होता ही जायेगा। कईयों के मन में यह भी है ना कि ना मालूम जन्म होगा वा क्या होगाजन्म होगाजैसे आप की मम्मा का जन्म हुआ वैसे होगाआप बच्चों का विवेक क्या कहता हैड्रामा की भावी को देख सकते होथोड़ा-थोड़ा देख सकते होजब आप लोग सबको कहते हो कि हम त्रिकालदर्शी बाप के बच्चे हैं तो आने वाले काल को नहीं जानते होआपके मन के विवेक अनुसार क्या होना चाहिएअव्यक्त स्थिति में स्थित होकर हाँ वा नाँ कहोतो जवाब निकल आयेगा। (इस रीति से बापदादा ने दो चार से पूछा) बहुत करके सभी का यही विचार था कि नहीं होगा। आज ही उत्तर चाहते हो या बाद में! हलचल तो नहीं चम रही है। यह भी एक खेल रचा जाता है। छोटे-छोटे बच्चे तालाब में पत्थर मारकर उनकी लहरों से खेलते हैं। तो यह भी एक खेल है। बाप तुम सभी के विचार सागर में प्रश्रों के पत्थर फेंक कर तुम्हारे बुद्धि रूपी सागर में लहर उत्पन्न कर रहे हैं। उन्ही लहरों का खेल बापदादा देख रहे हैं। अभी आप सबके साथ ही अव्यक्त रूप से स्थापना के कार्य में लगे रहेंगे। जब तक स्थापना का पार्ट है तब तक अव्यक्त रूप से आप सभी के साथ ही हैं। समझ गयेवतन में मम्मा को भी इमर्ज किया था। पता है क्या बात चलीजैसे साकार रूप में साकर वतन में मम्मा बोलती थी कि बाबा आप बैठे रहिये हम सभी काम कर लेंगे। इसी ही रीति से वतन में भी यही कहा कि हम सभी कार्य स्थापना के जो करने हैं वह करेंगे। आप बच्चों के साथ ही बच्चों को बहलाते रहिये। ऐसे ही साकार में कहती थी। वही वतन में रूह-रूहान चली। आप सभी के मन में तो होगा ही-कि हमारी मम्मा कहाँ गई। अभी यह राज इस समय स्पष्ट करने का नहीं है। कुछ समय के बाद सुनायेंगे कि वह कहाँ और क्या कर रही है। स्थापना के कार्य में भी मददगार है लेकिन भिन्न नाम रूप से। अच्छा - अब तो टाइम हो गया है।
आज वतन में दूर से ही सवेरे से खुशबू आ रही थी। देख रहे थे कैसे स्नेह से चीजे बना रहे हैं। आपने देखाभण्डारे में चक्र लगायाचीजों की खुशबू नहीं स्नेह की खुशबू आ रही थी। यह स्नेह ही अविनाशी बनता है। अविनाशी स्नेह है नायाद हरेक की पहुँचती हैउसका रेसपोंड लेने के लिए अवस्था चाहिए। रेसपान्ड फौरन मिलता है। जैसे साकार में बच्चे बाबा कहते थे तो बच्चों को रेसपांड मिलता था। तो रेसपान्ड अब भी फौरन मिलता है लेकिन बीच में व्यक्त भाव को छोड़ना पड़ेगा तब ही उस रेसपान्ड को सुन सकेंगे। अब तो और ही ज्यादा चारों ओर सर्विस करने का अनुभव कर रहे हैं। अब अव्यक्त होने के कारण एक और क्वालिटी बढ़ गई है। कौन सीमालूम हैवह यह है - पहले तो बाहरयामी थाअभी अन्तर्यामी हो गया हूँ। अव्यक्त स्थिति में जानने की आवश्यकता नहीं रहती। स्वत: ही एक सेकेण्ड में सभी का नक्शा देखने में आ रहा है। इसलिए कहते हैं कि पहले से एक और गुण बढ़ गया है। अव्यक्त स्थिति में तो खुशबू से ही पेट भर जाता है। आप लोगों को मालूम है?
एक मुख्य शिक्षा बच्चों के प्रति दे रहे हैं। अब सर्विस तो करनी ही हैयह तो सभी बच्चों की बुद्धि में लक्ष्य है और लक्ष्य को पूर्ण भी करेंगे लेकिन इस लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए बीच में एक मुख्य विघ्न आयेगा। वह कौन सापता हैमुख्य विघ्न सर्विस में बाधा डालने के लिए कौन सा आयेगासभी के आगे नहीं मैजारटी के आगे आयेगा! वह कौन सा विघ्न हैपहले से ही बता देते हैं। सर्विस करते-करते यह ध्यान रखना कि मैंने यह कियामैं ही यह कर सकता हूँ यह मैं पन आना इसको ही कहा जाता है ज्ञान का अभिमानबुद्धि का अभिमानसर्विस का अभिमान। इन रूपों में आगे चलकर विघ्न आयेंगे। लेकिन पहले से ही इस मुख्य विघ्न को आने नहीं देना। इसके लिए सदा एक शब्द याद रखना कि मैं निमित्त हूँ। निमित्त बनने से ही निरा- कारीनिरहंकारी और नम्रचितनिःसंकल्प अवस्था में रह सकते हैं।
अगर मैंने कियामैं-मैं आया तो मालूम है क्या होगाजैसे निमित्त बनने से निराकारीनिरहंकारीनिरसंकल्प स्थिति होती है वैसे ही मैं मैं आने से मगरूरीमुरझाइसमायूसी आ जायेगी। उसकी फिर रिजल्ट क्या होगीआखरीन अन्त में उसकी रिजल्ट यही होती है कि चलते-चलते जीते हुए भी मर जाते हैं। इसलिए इस मुख्य शिक्षा को हमेशा साथ रखना कि मैं निमित्त हूँ। निमित्त बनने से कोई भी अहंकार उत्पन्न नहीं होगा। नहीं तो अगर मैं पन आ गया तो मतभेद के चक्र में आ जायेंगे। इसलिए इन अनेक व्यर्थ के चक्करों से बचने के लिए स्वदर्शनचक्र को याद रखना। क्योंकि जैसे-जैसे महारथी बनेंगे वैसे ही माया भी महारथी रूप में आयेगी। साकार रूप में अन्त तक कर्म करके दिखाया। क्या कर्म करके दिखायायाद हैक्या शिक्षा दी यही कि निरहंकारी और निर्माणचित होकर एक दो में प्रेम प्यार से चलना है। एक माताओं का संगठन बनाना। जैसे कुमारियों का ट्रेनिंग क्लास किया है वैसे ही मातायें जो मददगार बन सकती हैं और हैंउन्हों का मधुबन में संगठन रखना। कुमारियों के साथ माताओं का संगठन हो। संगठन के समय फिर आना होगा। स्नेह को देखते हैं तो ड्रामा याद आ जाता है। ड्रामा जब बीच में आता है तो साइलेन्स हो जाते हैं। स्नेह में आये तो क्या हाल हो जायेगा। नदी बन जायेंगे। लेकिन नहींड्रामा। जो कर्म हम करेंगे वह फिर सभी करेंगेइसलिए साइलेन्स। अगर सभी साथ होते तो जो अन्तिम कर्मातीत अवस्था का अनुभव था वह ड्रामा प्रमाण और होता। लेकिन था ही ऐसे इसलिए थोड़े ही सामने थे। सामने होते भी जैसे सामने नहीं थे। स्नेह तो वतन में भी है और रहेगा। अविनाशी है ना। लेकिन जो सुनाया कि स्नेह को ड्रामा साइलेन्स में ले आता है। और यही साइलेन्सशक्ति को लायेगी। फिर वहाँ साकार में मिलन होगा। अभी अव्यक्त रूप में मिलते हैं। फिर साकार रूप में सतयुग में मिलेंगे। वह सीन तो याद आती है ना। खेलेंगेपाठ- शाला में आयेंगेमिलेंगे। आप नूरे रत्न सतयुग की सीनरी वतन में देखते रहते हो। जो बाप देखते हैं वह बच्चे भी देखते रहते हैं और देखते जायेंगे।
अब तो ज्वाला रूप होना है। आपका ही ज्वाला रूप का यादगार है। पता है ज्वाला देवी भी है वह कौन हैयह सभी शक्तियों को ज्वालारूप देवी बनना है। ऐसी ज्वाला प्रज्जवलित करनी है। जिस ज्वाला में यह कलियुगी संसार जलकर भस्म हो जायेगा। अच्छा -
विदाई के समय :-
सभी सेन्टर्स के अव्यक्त स्थिति में स्थत हुए नूरे रत्नों को बाप व दादा का अव्यक्त यादप्यार स्वीकार हो। साथ-साथ जो ईशारा दिया है उसको जल्दी से जल्दी जीवन में लाने का तीव्र पुरूषार्थ करना है। अच्छा गुडनाईट। सभी शिव शक्तियों और पाण्डवों प्रति बाप का नमस्ते।

Hindi Avyakt Vani 25/01/1969

25-01-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

"समर्पण की ऊँची स्टेज – श्वांसों श्वांस स्मृति"
अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर अव्यक्त को व्यक्त में देखो। आज एक प्रश्न पूछ रहे हैं। सर्व समर्पण बने हो? (सर्व समर्पण हैं ही) यह सभी का विचार है या और कोई का कोई और विचार हैसर्व समर्पण किसको कहा जाता हैसर्व में यह देह का भान भी आता है। देह ले लेंगे तो देनी भी पड़ेगी। लेकिन देह का भान तोड़कर समर्पण बनना है। आप क्या समझते होदेह के अभिमान से भी सम्पूर्ण समर्पण बने होमर गये हो वा मरते रहते होदेह के सम्बन्ध और मन के संकल्पों से भी तुम देही हो। यह देह का अभिमान बिल्कुल ही टूट जाए तब कहा जाए सर्व समर्पणमय जीवन। जो सर्व त्यागीसर्व समर्पण जीवन वाला होगा उनकी ही सम्पूर्ण अवस्था गाई जायेगी। और जब सम्पूर्ण बन जायेंगे तो साथ जायेंगे। आपने शुरू में संकल्प किया था ना कि बाबा जायेंगे तो हम भी साथ जायेंगे। फिर ऐसा क्यों नहीं कियायह भी एक स्नेह है। और संग तोड़ एक संग जोड़ने की यह चैन है जो अन्त समय की निशानी है। जब कहा था तो क्यों नहीं शरीर छोड़ाछोड़ सकते होअभी छूट भी नहीं सकता। क्योंकि जब तक हिसाब-किताब हैअपने शरीर से तब तक छूट नहीं सकता। योग से या भोग से हिसाब-किताब चुक्तू जरूर करना पड़ता है। कोई भी कड़ा हिसाब-किताब रहा हुआ है तो यह शरीर रहेगा। छूट नहीं सकता। वैसे तो समर्पण हो ही लेकिन अब समर्पण की स्टेज ऊँची हो गई है। समर्पण उसको कहा जाता है जो श्वांसों श्वांस स्मृति में रहे। एक भी श्वांस विस्मृति का न हो। हर श्वांस में स्मृति रहे और ऐसे जो होंगे उनकी निशानी क्या हैउनके चेहरे पर क्या नजर आयेगाक्या उनके मुख पर होगामालूम है?(हर्षितमुख) हर्षितमुखता के सिवाए और भी कुछ होगाजो जितना सहनशील होगा उनमें उतनी शक्ति बढ़ेगी। जो श्वांसों श्वांस स्मृति में रहता होगा उसमें सहनशी- लता का गुण जरूर होगा और सहनशील होने के कारण एक तो हर्षित और शक्ति दिखाई देगी। उनके चेहरे पर निर्बलता नहीं। यह जो कभी-कभी मुख से निकलता हैकैसे करेंक्या होगायह जो शब्द निर्बलता के हैंवह नहीं निकलने चाहिए। जब मन में आता है तो मुख पर आता है। परन्तु मन में नहीं आना चाहिए। मनमनाभव मध्याजी भव। मनमनाभव का अर्थ बहुत गुह्य है। मनबिल्कुल जैसे ड्रामा का सेकेण्ड बाई सेकेण्ड जिस रीति सेजैसा चलता हैउसी के साथ-साथ मन की स्थिति ऐसे ही ड्रामा की पटरी पर सीधी चलती रहे। जरा भी हिले नहीं। चाहे संकल्प सेचाहे वाणी से। ऐसी अवस्था होड्रामा की पटरी पर चल रहे हो। परन्तु कभी- कभी रुक जाते हो। मुख कभी हिल जाता है। मन की स्थिति हिलती है - फिर आप पकड़ते हो। यह भी जैसे एक दाग हो जाता है। अच्छा- फिर भी एक बात अब तक भी कुछ वाणी तक आई हैप्रैक्टिकल में नहीं आई है। कौन सी बात वाणी तक आई है प्रैक्टिकल नहींयही ड्रामा की ढाल जो सुनाई। लेकिन और बात भी बता रहे थे। वह यह है जैसे अब समय नजदीक हैवैसे समय के अनुसार जो अन्तर्मुखता की अवस्थावाणी से परेअन्तर्मुख होकरकर्मणा में अव्यक्त स्थिति में रहकर धारण करने की अवस्था दिखाई देनी चाहिएवह कुछ अभी भी कम है। कारोबार भी चले और यह स्थिति भी रहे। यह दोनों ही इक्ट्ठा एक समान रहे। अभी इसमें कमी है। अब साकार तो अव्यक्त स्थिति स्वरूप में स्थित है। लेकिन आप बच्चे भी अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे तो अव्यक्त मुलाकात का अलौकिक अनुभव कर सकते हो। एक मुख्य बात और भी हैवर्तमान समय ध्यान पर देते हैंजो तुम्हारे में होनी चाहिए। वह कौन सीकोई को आता हैजो मुख्य साकार रूप में भी कहते थे - अमृतवेले उठना। अमृतवेले का वायुमण्डल ऐसा ही रहेगा। साकार में अमृतवेले बच्चों से दूर होते भी मुलाकात करते थे। लेकिन अभी जब अमृतवेले चक्र लगाने बाबा आते हैं तो वह वायुमण्डल देखा नहीं है। क्यों थक गयेइस अमृ- तवेले के अलौकिक अनुभव में थकावट दूर हो जाती है। परन्तु यह कमी देखने में आती है। यह बापदादा की शुभ इच्छा है कि जल्दी से जल्दी इस अव्यक्त स्थिति का हर एक बच्चा अनुभव करे। वैसे तो आप जब साकार से साकार रीति से मिलते थे तो आप की आकारी स्थिति बन जाती थी। अब जितना-जितना अव्यक्त आकारी स्थिति में स्थित होंगे उतना ही अलौकिक अनुभव करेंगे।

Hindi Avyakt Vani 23/01/1969

23-01-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

"अस्थियाँ हैं – स्थिति की स्मृति दिलाने वाली"
आज मैं आप सभी बच्चों से अव्यक्त रूप में मिलने आया हूँ। जो मेरे बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित होंगे वही इसको समझ सकेंगे। आप सभी बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित हो किसको देख रहे होव्यक्त रूप में या अव्यक्त रूप मेंआप व्यक्त हो या अव्यक्तअगर व्यक्त में देखेंगे तो बाप को नहीं देख सकेंगे। आज अव्यक्त वतन से मुलाकात करने आया हूँ। अव्यक्त वतन में आवाज नहीं परन्तु यहाँ आवाज में आया हूँ। आप सभी बच्चों के अन्दर में कौन-सा संकल्प चल रहा हैअभी यह अव्यक्त मुलाकात है। जैसे कल्प पहले मिसल बच्चों से रूहरूहान चल रही है। रूह-रूहान करने मीठे-मीठे बाबा ने आप सभी बच्चों से मिलने भेजा है। जो थे वह अब भी हैं। दो तीन दिन पहले मीठे-मीठे बाबा से रूह-रूहान चल रही थी। रूह-रूहान क्या हैमालूम हैबाबा ने बोलावतन का अनुभव करने के लिए तैयार होक्या जवाब दिया होगायही कहा कि जो बाप की आज्ञा। जैसे चलायेंगेजहाँ बिठायेंगे जिस रूप में बिठायेंगे। बच्चों के अन्दर यही संकल्प होगा कि बापदादा ने छुट्टी क्यों नहीं लीबाबा को भी यह कहा। बाबा ने कहा अगर सभी बच्चों को बिठाकर छुट्टी दिलाऊँ तो छुट्टी देंगेआप भी बच्चों को देखसर्विस को देख बच्चों के स्नेह में आ जायेंगे। इसलिए जो बाप ने कराया वही ड्रामा की भावी कहेंगे। व्यक्त रूप में नहींतो अव्यक्त रूप से मुलाकात कर ही रहे हैं। सर्विस की वृद्धि वैसे ही हैबच्चों की याद वैसे ही है लेकिन अन्तर यह है कि वह व्यक्त में अव्यक्त था और यह अव्यक्त ही है। जो नयनों की मुलाकात जानते होंगे वह नयनों से इस थोड़ी सी मुलाकात में अपने प्रति शिक्षा डायरेक्शन ले लेंगे। आप सभी को वतन में तो आना ही है। बच्चों से मुला- कात करने के लिए हर वक्तहर समय तैयार ही रहते हैं। अब जहाँ तक बच्चों की जितनी बुद्धि क्लीयर होगीउसी अनुसार ही अव्यक्त मिलन का अनुभव कर सकेंगे। शक्ति स्वरूप में स्थित हैं? (दीदी से) जैसे साथ थे वैसे ही हैं। अलग नहीं। अभी शक्ति स्वरूप का पार्ट प्रत्यक्ष में दिखाना है। जो बाप की शिक्षा मिली हैवह प्रैक्टिकल में करके दिखाना है। शक्ति सेना बहुत हैअभी पूरा शक्ति स्वरूप बन जाना। अभी तक बच्चे और बाप के स्नेह में चलते रहे। अब फिर बाप से जो शक्ति मिली है उस शक्ति से औरों को ऐसा शक्तिवान् बनाना है। वही बाप के स्नेही बाप के साथ अन्त तक रहेंगे। अभी मीठे-मीठे बाबा दृश्य दिखला रहे हैं - आप सभी बच्चों का। आप अस्थियाँ उठा रहे थे। अस्थियों को नहीं देखना स्थिति को देखना। यह अस्थियाँ स्थिति स्वरूप हैं। एक एक रग में स्थिति थी। तो बाहर से वह अस्थियों को रखा है। परन्तु इसका अर्थ भक्ति मार्ग का नहीं उठाना। इन अस्थियों में जो स्थिति भरी हुई हैहमेशा उसको देखना है। साधारण मनुष्यों को यह बातें इतना समझ में नहीं आयेगी। बच्चों का स्नेह है और सदा रहेगा21 जन्म तक रहेगा। आप सभी सतयुगी दुनिया में साथ नहीं चलेंगेराज्य साथ नहीं पायेंगेसाथ ही हैंसाथ ही रहेंगे-जन्म जन्मान्तर तक। अभी भी ऐसा नहीं समझनाबाप है दादा नहीं या दादा है तो बाप नहीं। हम दोनों एक दो से एक पल भी अलग नहीं हो सकते। ऐसे ही आप अपने को त्रिमूर्ति ही समझो। इसीलिए कहते हैं त्रिमूर्ति का बैज हमेशा साथ रखो। जब ब्रह्माविष्णु और शंकर तीन को देखते हो तो आपके भी त्रिमूर्ति की याद अर्थात् अपना स्वरूप और बापदादा की यादत्रिमूर्ति की स्थिति मशहूर है। इसमें ही आप सभी बच्चों का कल्याण है। कल्याणकारी बाप जो कहते हैंजो कराते हैंउसमें ही कल्याण है। इसमें एक एक महावाक्य मेंएक-एक नजर में बहुत कल्याण है। लेकिन स्थूल को परखने वाले कोई कोई अनन्य और महारथी बच्चे हैं। अब आप भी इतना ही शीघ्र कर्मातीत स्थिति में स्थित रहने का पुरुषार्थ करो। जैसे यहाँ हर समय बापदादा के साथ व्यतीत करते थे वैसे ही हर कर्म मेंहर समय अपने को साथ ही रखा करो। बच्चेयही शिक्षा याद रखनाकभी नहीं भूलना। सम्बन्धस्नेहस्मृति स्वरूपसाथ-साथ सरलता स्वरूपसमर्पण और एक दो के सहयोगी बन सफलता को पाते रहना। सफलता आप सभी बच्चों के मस्तक के बीच चमक रही है। अब बहुत समय हुआ है और कुछ कहना हैसूक्ष्मवतन में बैठे भी हर बच्चे की दिनचर्याहर बच्चे का चार्ट सामने रहता है। व्यक्त रूप से अभी तो और ही स्पष्ट रूप से देखते हैं। इसलिए सभी की रिजल्ट देखते रहते हैं।
जितना अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे उतना उस अव्यक्त स्थिति से कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म ऐसा होगा जैसे श्रीमत राय दे रही है। यह अनुभव बच्चे पायेंगे। अब अपनी अव्यक्त स्थिति के आधार से ऐसा काम करनाजैसे श्रीमत के आधार से हर काम होता रहा है। जिस चीज के साथ बाप का स्नेह है उससे उतना स्नेह रखना ही अपने को सौभाग्यशाली बनाना है। रग-रग में किस के साथ स्नेह था5 तत्वों से नहीं। स्नेह गुणों से ही होता है। स्नेह थानहीं। है और रहेगा। जब तक भविष्य नई दुनिया न बनी है तब तक यह अटूट स्नेह रहेगा। स्नेह आत्मा के साथ और कर्तव्य के साथ ही है तो फिर शरीर क्या! अन्त तक साथी रहेंगे। जिसका बाप के साथ स्नेह है वही अन्त तक स्थापना के कार्य में मददगार रहेंगे। इसलिए स्नेही होने की कोशिश करो। कैसी भी माया आवेमायाजीत बनना। जैसे बैज लगाते हो वैसे मस्तक पर यह विजय का बैज लगाओ।
मधुबन का नक्शा सारे वर्ल्ड के सामने म्युजियम के रूप में होना चाहिए। अविनाशी भण्डारा है इसका और भी ज्यादा शो करना है। जैसे सभी बच्चे पत्र लिखते थे वैसे ही लिखते रहना। जैसे डायरेक्शन लेते थे वैसे ही लेना। शरीर की बात दूसरी है। सर्विस वही है। इसलिए जो भी बात हो मधुबन में लिखते रहना। अपना पूरा कनेक्शन रखना। दूसरों को भी अपनी अवस्था का सबूत देना। आपको देख और भी ऐसे करेंगे।
(विदाई के समय)
यह तो आप बच्चे जानते हो कि जो भी ड्रामा का पार्ट है इसमें कोई गुप्त रहस्य भरा हुआ है। क्या रहस्य भरा हुआ है वह समय प्रति समय सुनाते जायेंगे। अब तो आपका वही यादगार जो आकाश में हैदुनिया वाले इन आँखों से देखेंगे कि यह धरती के सितारे किसकी श्रीमत से चल रहे हैं। बाबा ने कहा है - ज्यादा समय वहाँ नहीं बैठना।

Hindi Avyakt Vani 22/01/1969

22-01-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

"दोपहर भोग के समय वतन का समाचार"
आज वतन में गई तो ब्रह्मा बाबा जैसे यहाँ मुलाकात करते थे वैसे वहाँ ब्रह्मा बाबा ने मुलाकात की। बाबा ने कहा बच्चों के भोजन के समय के अनुसार लेट आई हो। मैंने कहा - बाबा आपका तो एक डेढ बजे भोजन पान करने का समय था। बाबा ने कहा बाबा जब बच्चों के साथ भोजन खाता था तो बच्चों के टाइम भोजन खाता था। उस टाइम से लेट आई हो। फिर बाबा ने ब्रह्मा बाबा को कहा कि ले जाओ ....क्या जाकर देखा कि जैसे यहाँ आफिस में कुर्सी पर बाबा आकर बैठता थापत्र लिखता था तो वही कुर्सीवही पैडवही पेंसिल रखी थी। मैं तो हैरान हुई कि यह सभी चीज़ें वतन में कैसे आ गई। फिर बाबा ने हस्त लिखित पत्र मेरे को दिया। मैंने पढ़ा - जिसमें लिखा हुआ था
"स्वदर्शन चक्रधारी नूरे रत्नों याद-प्यार के बादआज अव्यक्त रूप से आप अव्यक्त स्थिति में स्थित हुए बच्चों से मिल रहे हैं।दूसरे पेज में लिखा था - "बच्चेजो बापदादा के साकार रूप से शिक्षायें मिली हैं उसका विस्तार करते रहना। अब न बिसरों न याद रहो।" विदाई के बाद बाबा जैसे सही डालते हैं वैसे डाली हुई थी। बाबा ने कहा हमने अपने समय पर पत्र भी लिखा फिर भोजन के लिए इंतजार कर रहे थे। फिर तो भोजन खिलाया। कहा - भल वतन में चीज़ें खाते हैं लेकिन यज्ञ के भोजन की रसना बहुत अच्छी है। फिर बाबा ने भोजन स्वीकार किया। जब हम आ रही थी - तो बाबा ने एक दृश्य दिखाया - एक सागर था जिसमें बहुत तेज लहरें चल रही थी। बाबा ने कहा आप इस सागर के बीच में जाओ। मैं घबराने लगी कि इतनी तेज लहरों में कैसे जाउंगी। फिर बाबा की आज्ञा प्रमाण पांव डाला। जहाँ पाँव रखा वहाँ की लहर शान्त होती गई। फिर देखा कि बापदादा दोनों ने उसमें छोटी-छोटी नावें उस सागर के बीच में डाली लेकिन सागर की लहर आने से गायब हो गई। कोई तो लहर से इधर-उधर होती रही। कोई तो जैसी थी वैसे ही रही हम यह देखने में ही बिजी हो गई। फिर वह सीन खत्म हो गई। बापदादा ने कहा कि यह खेल बाप ने प्रैक्टिकल में रचा है। जिन बच्चों की जीवन रूपी नईया बाप के साथ में होगी वह हिलेगी नहीं। अभी तुम परीक्षाओं रूपी सागर के बीच में चल रहे हो। तो जिनका कनेक्शन अर्थात् जिनका हाथ बापदादा के हाथ में होगा उनकी यह जीवन रूपी नैया न हिलेगी न डूबेगी। तुम बच्चे इसको ड्रामा का खेल समझकर चलेंगे तो डगमग नहीं होंगे। और जिसका बुद्धि रूपी हाथ साथ ढीला होगा वह डोलते रहेंगे। इसलिए बच्चों को बुद्धि रूपी हाथ मजबूत रखने का खास ध्यान रखना है।

Hindi Avyakt Murli 21/01/1969 part2

21-01-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"शरीर छूटा परन्तु हाथ और साथ नहीं"
सभी अव्यक्त मूर्त हो बैठे होव्यक्त रूप में रहते अव्यक्त स्थिति में रहना है। जब अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जायेंगे तो उस अव्यक्त स्थिति में कोई उलझन नहीं रहेगी। वर्तमान समय चल रहे सभी पार्ट आप बच्चों को अति शीघ्र अव्यक्त बनाने के साधन है। डगमग होने की जरूरत नहीं। शुरू में यह की स्थापना भी अनायास ही हुई थी। जब आप शुरू में यज्ञ की स्थापना में आये थे तो आप सभी से निश्चय के पत्र लिखाये थे। यही निश्चय लिखाते थे कि अगर ब्रह्मा चला जाए - तब भी हमारी अवस्थाहमारा निश्चय अटल रहेगा। वह निश्चय पत्र याद हैनिश्चय उसको कहा जाता है जिसमें किसी भी प्रकार काकिसी भी स्थिति अनुसारविघ्न के समय संशय नहीं आता। परिस्थितियों तो बदलनी ही हैंबदलती ही रहेंगी। लेकिन आप जैसे गीत गाते हो ना-बदल जाए दुनिया न बदलेंगे हम तो ऐसे ही आप सभी निश्चय बुद्धि आज के संगठन में बैठे हुए होआपकी मम्मा आप सबको कहा करती थी कि निश्चय के जो भी आधार अब तक खड़े हैं वह सब आधार निकलने ही हैं और निकलते हुए भी उसकी नींव मजबूत है। अगर नींव मजबूत नहीं तो आधार की आवश्यकता है। आधार कौनसाबाबा का आधारसंग- ठन का आधारपरिवार के नियमों का आधार नहीं छोड़ना। परन्तु परीक्षा के समय जो सीन सामने आती है उसमें निश्चय तो नहीं टूटा। निश्चय अटूट होता है। वह तोड़ने से टूटता नहीं। ऐसे ही निश्चय बुद्धि गले के हार हैं। क्या ब्रह्मा आपका बहुत प्यारा हैथा नहीं परन्तु है। तो क्या वह नहीं कहा करते थेबातें तो सभी बोली हुई हैं। समय पर याद आना ही तीव्र पुरुषार्थ है। याद करो। वह भी आप बच्चों को मजबूत बनाने के लिए कहते थे। बापदादा ने बच्चों का इतना श्रृंगार किया है तो क्या बच्चे इतना श्रृंगार धारी नहीं बने हैंएक दिन ऐसा समय आयेगा जो इस बापदादा के श्रृंगार को याद करेंगे। तो अभी वह समय है। पहले तो वह अपने को निरहंकारीनम्रचित कहते हुए कई बच्चों को यह सुनाते थे कि मैं भी अभी सम्पूर्ण नहीं बना हूँ। मैं भी अभी निरन्तर देही अभिमानी नहीं बना हूँ। लेकिन आपने अपने अनुभव के आधार से तीन चार मास के अन्दर ध्यान दिया होगासन्मुख मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ होगा तो अनुभव किया होगा कि यह ब्रह्मा अब साकारी नहीं लेकिन अव्यक्त आकारी रूपधारी है। कुछ वर्ष पहले ब्रह्मा छोटी-छोटी बातें सुनते थेसमय देते थे लेकिन अब क्या देखाइन छोटी-छोटी बातों को न सुनने का कारण क्या था कि यह समय निरन्तर याद में बीते। क्या आप बच्चों ने उनके तन द्वारा कभी नोट नहीं किया कि उनके मस्तक में सितारा चमकता हुआ नजर आता थाअव्यक्त स्थिति में जो होंगे उन्होंने अव्यक्त मूर्त को जानापहचाना। जो खुद नहीं अव्यक्त अवस्था में रहते थे उन्हों ने अमूल्य रतन को पूरी रीति नहीं पहचाना। अभी भी स्थापना का कार्य ब्रह्मा का है न कि हमारा। अभी भी आप बच्चों की पालना ब्रह्मा द्वारा ही होगी। स्थापना के अन्त तक ब्रह्मा का ही पार्ट है। अभी आप सभी बच्चे सोचते होंगे कि ब्रह्मा द्वारा पढ़ाई कैसे होगी। यूँ तो वास्तव में अवस्था के प्रमाण कैसेक्यों के क्वेश्चन उठना नहीं चाहिए। लेकिन कई बच्चों के अन्दर प्रश्न तो क्या लेकिन काफी हलचल का सागर शुरू हो गया है। यह पहला पेपर बहुत थोड़ों ने पास किया। कुछ तो धीर्य रखो। जब अविनाशी ज्ञान हैअविनाशी पढ़ाई है तो फिर यह प्रश्नों की हलचल क्योंफिर भी उसी हलचल को शान्त करने के लिए समझा रहे हैं।
क्लास जैसे चलती है वैसे ही चलेगी। क्या सुनायेंगेजो ब्रह्मा का तन मुकरर है तो मुरली उसी के तन द्वारा जो चली है वही मुरली है। और सन्देशियों द्वारा थोड़े समय के लिए जो सर्विस करते हैंउनको मुरली नहीं कहा जाता है। उस मुरली में जादू नहीं है। बापदादा की मुरली में ही जादू है। इसलिए जो भी मुरलियॉ चल चुकी हैंवह सभी रिवाइज करनी है। जैसे पहले पोस्ट जाती थी वैसे ही मुख्य सेवाकेन्द्र पर आबू से जाती रहेगी। क्या आपको एक वर्ष पहले जो मुरली चली थी वह याद हैकल जो पढ़ी होगी वह भी याद नहीं होगी। कई प्याइन्ट्स ऐसी हैं जो कई बार पढ़ने से भी बुद्धि में नहीं ठहरती। इसलिए मुरली और पत्र का जैसे कनेक्शन होता है वैसे ही होगा। जैसे आप मधुबन में रिफ्रेश होने आते हो वैसे ही आयेंगे। क्या करेंकिससे मिलने आवेंअब फिर यह प्रश्न उठता हैकिससे रिफ्रेश होंगेजो लकी सितारे हैं अर्थात् जो निमित्त मुख्य हैं उनके साथ पूरा सम्बन्ध जोड़कर जो भी आपके सेवाकेन्द्र की रिजल्ट हैसमस्याएं है जो भी सेवाकेन्द्रो की उन्नति हैजो भी नये-नये फूल उस फुलवाडी से खिलते हैंउनको भी संगठन का साक्षात्कार कराने मधुबन में ले आना है। साथ-साथ ऐसे संगठन के बीच बापदादा निमित्त बनी हुई सन्देशी द्वारा पूरी सेवा करेंगे। अभी कोई और प्रश्न रहाआप सोचते होंगे कि लोग पूछेंगे कि आपका ब्रह्मा बाबा 100 वर्ष से पहले ही चला गया। यह तो बहुत सहज प्रश्न है कोई मुश्किल नहीं। 100 के नजदीक ही तो आयु थी यह जो 100 वर्ष कहे हुए हैं यह गलत नहीं है। अगर कुछ रहा हुआ है तो आकार द्वारा पूरा करेंगे। 100 वर्ष ब्रह्मा की स्थापना का पार्ट है। वह तो 100 वर्ष पूरा होना ही है लेकिन बीच में ब्रह्मा के बाद ब्राह्मणों का जो पार्ट है वह अब चलना है। ब्रह्मा ने ब्राह्मण किसलिए रचेक्या ब्रह्मा अपनी रचना को देखेंगे नहींक्या आपको अब काम पर जिम्मेवारी का ताज नहीं देंगेतो सतयुग में देवता कैसे बनेंगे। यहाँ की जिम्मेवारी ही वहाँ की नींव डालती है। इसलिए जो भी आप बच्चों से प्रश्न करते हैं उन्हें यही उत्तर दो कि ब्रह्मा की स्थापना तो चलनी ही है। अभी बच्चों की पढ़ाई का समय बिल्कुल ही नजदीक है। यह तो हरेक मुरली में मम्मा के बाद ईशारा दिया है। क्या पेपर में तिथि तारीख बताया जाता हैजो पहले से ही बताया जाए उसको क्या पेपर कहेंगेपेपर वह होता है जो अचानक होता है। किसके मन में जो होता है वह अचानक नहीं होता है। रिजल्ट में क्या देखा! पूरे पास नहीं हुए। कुछ न कुछ कमी एक-एक में देखी। फिर भी बहुत अच्छा। क्योंकि समय पुरुषार्थ का है। उस प्रमाण रिजल्ट अच्छी ही कहेंगे। बाकी तो बापदादा दोनों ही एक बात पर खुश थे। वह कौनसी?
बच्चों ने संगठन और स्नेह दोनों का सबूत दिया। ब्रह्मा वतन से देख रहे थे कि कैसे-कैसे कोई आता हैकब-कब आता है। किस रूहाब से आता है। किस स्थिति से मिलते हैं! यह भी रिजल्ट बापदादा दोनों ही इकट्ठे देखते रहे। तो हरेक खुद को देखे और खुद में जो कमी हो उसको भरे। बाकी आज से सभी के लिए कौन निमित्त हैवह तो आप जानते ही हैं - दीदी तो हैसाथ में कुमारका मददगार है। जैसे और सभी लिखा-पढ़ी चलती थी वैसे ही हेड क्वार्टर से चलती रहेगी। यह दोनों आप सभी की देख-रेख करती रहेंगी। अगर आवश्यकता हुई तो आप सभी के सेवाकेन्द्रों पर चक्कर लगाती रहेंगी। लेकिन अब का पेपर क्या हैयह तो अचानक पेपर निकला परन्तु जो आने वाला पेपर हैवह बताते हैं। अब एकमतअन्तर्मुख और अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर सम्बन्ध में आओ। यही बापदादा जो पेपर बता रहे हैं उसकी रिजल्ट देखेंगे। पिछाड़ी के समय ब्रह्मा तन द्वारा जो शिक्षा दी है वह तो सभी ने सुनी ही होगी और याद भी होगी।
आज के दिन इस संगठन के बीच कुछ देने भी आये हो तो कुछ लेने भी आये हो। तो जो लेंगे वह देने के लिए तैयार हैंजिसके दिल में कुछ संकल्प आता हो कि नामालूम क्या हो-ऐसी तो कोई बात नहीं होगी वह हाथ उठावे - अगर सभी सन्तुष्ट हैं तो जो लेंगे उसको देने में भी सन्तुष्ट रहेंगे। दो बातों का आज इस संगठन के बीच दान देना है। कौनसी दो बातेंएक मुख्य बात कि आज से आपस में एक दो का अवगुण न देखनान सुननान चित पर रखना। अगर कोई बहिन या भाई की कोई भी बात देखने में आये तो निमित्त बने हुए जो हैं उनके द्वारा उनको ईशारा दिला सकते हो। दूसरी बात कई लोग आपके निश्चय को डगमग करने के लिए बातें बोलेंगेआवाज फैलयेंगे कि अब देखे यह संस्था कैसे चलती है। लेकिन उन लोगों को यह मालूम नहीं कि इन्हों का आधार अविनाशी है। दूसरा यह भी ध्यान में रखना कि कोई भी हिलाने की कोशिश करे तो जैसे आप बच्चों का कल्प पहले का गायन है अंगद के समान पांव को नहीं हिलाना है। ऐसे निश्चय बुद्धि अडोलएकरस हीजो आने वाले लास्ट पेपर हैंउसमें पास होंगे। और ही ब्रह्मा द्वारा जो इतने ब्राह्मण रचे हैं तो क्या बाप के जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो बाप रिटायर नहीं होताअब ऐसे समझो कि बाप रिटायर अवस्था में भी आपके साथ है। आप बच्चों को कार्य देकर देखते रहेंगे। शरीर छूटा परन्तु हाथ-साथ नहीं छूटा। बुद्धि का साथ-हाथ नहीं छूटा। वह तो अविनाशी कायम रहेगा। यह दो बातें जो सुनाई-एक डगमग न होने का दान देना है। दूसरा अवगुण न देखने का दान देना है। अगर सभी बच्चे यह ध्यान दे जबकि संकल्प कर चुके आर्थात् दे चुके। संकल्प की हुई चीज कभी वापस नहीं ली जाती। अगर माया वापस लेने की कोशिश कराये भी तो यदि अपने ऊपर जाँच होगी तो पास हो जायेंगे।
अभी एक और बात आप सबके ध्यान पर दे रहे हैं -
बापदादा की लास्ट मुरली में जो शिक्षा मिली है कि यह ध्यान दीदार ज्यादा चलाना समय व्यर्थ गंवाना है। इसलिए यह नहीं होना चाहिए। ऐसे न हो सन्देशियों द्वारा सेन्टर पर जो पार्ट चलेउसे आप चेक न कर पाओ। इस- लिए यह निमित्त बनी हुई दीदी और कुमारका जिस सन्देशी को मुकरर करेगी उन्हों के द्वारा डायरेक्शन मिलेंगे। इस पार्ट के लिए भी यह जिसको निमित्त बनायेंगी उस द्वारा ही रहस्य स्पष्ट होंगे। जैसे पिछाड़ी की मुरली में यह भी डायरेक्शन था कि भोग के समय बैकुण्ठ आदि में जाना व्यर्थ समय गंवाना है। क्योंकि यह घूमना फिरना अब शोभता नहीं। अब तो निरन्तर याद की यात्रा और जो शिक्षा मिली है उसे प्रैक्टिकल लाइफ में धारण करने का सबूत देना है। अगर ब्रह्मा बाबा के साथ स्नेह है तो स्नेह की निशानी क्या हैस्नेह यह नहीं कि दो आंसू बहा दिये। परन्तु स्नेह उसको कहा जाता है - जिस चीज से उसका स्नेह था उससे आपका हो। उसका स्नेह था सर्विस से। पिछाड़ी में भी सर्विस का सबूत दिया ना। तो स्नेह कहा जाता है सर्विस से प्यारउसकी आज्ञाओं से प्यार। बाकी कोई भी ऐसा न समझे कि ना मालूम बिना हम बच्चों की छुट्टी के साकार बाबा को वतन में क्यों बुलाया। लेकिन छुट्टी दिलाते तो आप देतेइसीलिए ड्रामा में पहले भी देखा कि जो भी गये छुट्टी लेकर नहीं गये। इसलिए यह समझो कि ब्राह्मण कुल की ड्रामा में यह रसम है। जो ड्रामा में नूंधी हुई है वह रसम चली। यूँ तो समझते हैं कि आप सभी का बहुत प्यार साकार के साथ था। था नहीं है भी। प्यार नहीं होता तो इस सभा में कैसे होते। साकार में फॉलो करने के लिए इनका ही तन था तो प्यार क्यों नहीं होगा। स्नेह था और है भी। यह बाप बच्चों की निशानी है। इससे साकार भी वतन में मुस्करा रहे हैं। बच्चों का स्नेह है तो क्यों मेरा नहीं। लेकिन वह जानते हैं कि ड्रामा में जो भी पार्ट होता है वह कल्याण- कारी है। वह विचलित नहीं होते। वह तो सम्पूर्ण अचलअडोलस्थिर था और है भी। लेकिन आप बच्चों से हजार गुणा स्नेह उनमें जास्ती है। अब स्नेह का सबूत देना है। यह भी एक छिपने का खेल है। तो विचार सागर मंथन करोहलचल का मंथन न करो। जो शक्ति ली है उनको प्रत्यक्ष में लाओ। भारत माता शक्ति अवतार अन्त का यही नारा है। सन शोज फादर। ड्रामा की नूंध करायेगी। साकार बाबा ने कहा मैं बच्चों से मिलन मनाने आऊंगा। अगर आज आ जाता तो बच्चे आंसू बहा देते।
अच्छा !

Hindi Avyakt Murli 21/01/1969 part1

21-01-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"अमृतवेले – प्राप्त दिव्य सन्देश"
आज जब वतन में गई तो सभी बच्चों की ओर से बाबा को यादप्यार दी और अर्जी डाली। ब्रह्मा बाबा को भी अर्जी डाली। तो ब्रह्मा बाबा यही बोले कि मेरा हाथ तो शिवबाबा के पास है। जो करायेंगे हम वही करेंगे। हमने शिवबाबा से बोला - बाबाइतने सभी आपके बच्चे हैंआप सभी आशायें पूर्ण करने वाले हो। बाबा एक आश हमारी पूर्ण कर दो-तो बाबा ने फौरन एक डाल दिखाई जिसके बीच में लिखा हुआ था - भावी टाले नाहिं टले। तो हमने बाबा को कहा अगर यही भावी है तो सभी बच्चे जो इक्ट्ठे हुए हैं वे शिवबाबा और ब्रह्मा बाबा दोनों से मिलना चाहते हैं। बापदादा ने कहा जैसे हमेशा बापदादा बच्चों से मिलते हैं वैसे आज भी बच्चों से मिलेंगे। फिर शिवबाबा ने ब्रह्मा बाबा से कहा कि आपकी क्या राय है। शिवबाबा ने कहा कि जब बच्चा बड़ा होता है तो बाप और बच्चा समान होता है। तो मैं भी मुरब्बी बच्चे की राय बिना कुछ नहीं कर सकता हूँ। पहले बाप फिर बच्चाअभी है पहले बच्चा फिर बाप। तो यही वतन में देखा - दोनों ही एक समान और एक दो के बहुत स्नेह और प्रेम में थे। जैसे दो मित्र मिलते हैंऐसे ही बाप-दादा दोनों की आपस में रूहरूहान की सीन दिखाई दे रही थी। ब्रह्मा बाबा कहे जो आज्ञा और शिवबाबा कहे जो बच्चे की राय। दोनों ही मुस्करा रहे थे। हमने कहा एक सेकेण्ड के लिए बच्चों से मुलाकात करके आइये। उस समय दोनों की तरफ देखा तो आँखों से ऐसा लगा कि जो शिवबाबा ने कहा वह ब्रह्मा बाबा को मंजूर था। 
(बापदादा गुलजार सन्देशी के तन में पधारे - और महावाक्य उच्चारण किये)
"आपको आकारी बनाने बापदादा अभी भी कायम है और कायम रहेगा। अभी बापदादा आप रूहानी रत्नों से मिल विदाई लेते हैं फिर मिलेंगे। जो होता है उसमें कल्याण है। बापदादा और कल्याण। और कोई शब्द नहीं।"
(सन्देशी के वापस आने पर वतन का सन्देश)
बाबा ने कहा - प्यार और याद। जैसे इस समय हर एक के अन्दर बाबा देखकर आये हैं। ऐसे ही याद और प्यार हमेशा कायम रखेंगे। यह याद और प्यार जैसे कि एक रस्सी है। उस रस्सी को कायम रखना है। इस रस्सी के जरिये बीच में मिलते रहेंगे। बाबा ने कहा स्थापना का कार्य जो और जैसे आदि से चला है अन्त तक ऐसे ही चलेगा। अन्तर नहीं। जिन बच्चों को बाबा निमित्त रखते हैं उन्हों द्वारा बापदादा सभी बच्चों को डायरेक्शन देते रहेंगे। और बच्चे अनुभव करते रहेंगे कि कैसे बापदादा की इक्टठी डायरेक्शन होगी। संगमयुग पर बापदादा दोनों को अलग नहीं होना है। बाबा ने कहा सभी को दो शब्द कहना - अटल और अखण्ड। यह बापदादा दोनों की सौगात है। जैसे कोई बड़े लोग कहाँ जाते हैं तो सौगात देते हैं। ऐसे बापदादा दोनों ही दो शब्दों की सौगात देते हैं अटल और अखण्ड। इसे बुद्धि रूपी तिजोरी में ऐसा रखें जो कितना भी कोई चुराने की कोशिश करे तो भी सौगात साथ रहे। फिर बाबा ने कहाअब थोड़े समय के लिए विदाई लेता हूँ। फिर जैसे-जैसे कार्य होगा डायरेक्शन देता रहूँगा।

Hindi Avyakt Murli 18/01/1969

18-01-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"18 जनवरी 1969 – पिताश्री जी के अव्यक्त होने के बाद – अव्यक्त वतन से प्राप्त दिव्य सन्देश"
(गुलज़ार बहिन द्वारा)
1. आज जब हम वतन में गई तो शिवबाबा बोले - साकार ब्रह्मा की आत्मा में आदि से अन्त तक 84 जन्मों के चक्र लगाने के संस्कार हैं तो आज भी वतन से चक्र लगाने गये थे। जैसे साइंस वाले राकेट द्वारा चन्द्रमा तक पहुँचे - और जितना चन्द्रमा के नजदीक पहुँचते गये उतना इस धरती की आकर्षण से दूर होते गये। पृथ्वी की आकर्षण खत्म हो गई। वहाँ पहुँचने पर बहुत हल्कापन महसूस होता है। जैसे तुम बच्चे जब सूक्ष्मवतन में आते हो तो स्थूल आकर्षण खत्म हो जाती है तो वहाँ भी धरती की आकर्षण नहीं रहती है। यह है ध्यान द्वारा और वह है साइंस द्वारा। और भी एक अन्तर बापदादा सुना रहे थे - कि वह लोग जब राकेट में चलते हैं तो लौटने का कनेक्शन नीचे वालों से होता है लेकिन यहाँ तो जब चाहेंजैसे चाहें अपने हाथ में है। इसके बाद बाबा ने एक दृश्य दिखाया - एक लाइट की बहुत ऊँची पहाड़ी थी। उस पहाड़ी के नीचे शक्ति सेना और पाण्डव दल था। ऊपर में बापदादा खड़े थे। इसके बाद बहुत भीड़ हो गई। हम सभी वहाँ खड़े ऐसे लग रहे थे जैसे साकारी नहीं लेकिन मन्दिर के साक्षात्कार मूर्त खड़े हैं। सभी ऊपर देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन ऊपर देख नहीं सके। जैसे सभी बहुत तरस रहे थे। फिर थोड़ी देर में एक आकाशवाणी की तरह आवाज आई कि शक्तियों और पाण्डवों द्वारा ही कल्याण होना है। उस समय हम सबके चहरे पर बहुत ही रहमदिल का भाव था। उसके बाद फिर कई लोगों को शक्तियों और पाण्डवों से अव्यक्त ब्रह्मा का साक्षात्कारशिवबाबा का साक्षात्कार होने लगा। फिर तो वह सीन देखने की थी कोई हसँ रहा थाकोई पकड़ने की कोशिश कर रहा थाकोई प्रेम में आंसू बहा रहा था। लेकिन सारी शक्तियाँ आग के गोले समान तेजस्वी रूप में स्थित थी। इस पर बाबा ने सुनाया कि अन्त समय में तुम्हारा यह व्यक्त शरीर भी बिल्कुल स्थिर हो जायेगा। अभी तो पुराना हिसाब-किताब होने के कारण शरीर अपनी तरफ खींचता है लेकिन अन्त में बिल्कुल स्थिरशान्त हो जायेगा। कोई भी हल- चल न मन मेंन तन में रहेगी। जिसको ही बाबा कहते हैं देही अभिमानी स्थिति। दृश्य समाप्त होने के बाद बाबा ने कहा - सभी बच्चों को कहना कि अभी देही अभिमानी बनने का पुरुषार्थ करो। जितना सर्विस पर ध्यान है उतना ही इस मुख्य बात पर भी ध्यान रहे कि देही अभिमानी बनना है। 
2. आज जब मैं वतन में गई तो बापदादा हम सभी बच्चों का स्वागत करने के लिए सामने उपस्थित थे। और जैसे ही मैं पहुँची तो जैसे साकार रूप में दृष्टि से याद लेते थे वैसे ही अनुभव हुआ लेकिन आज की दृष्टि में विशेष प्रेम के सागर का रूप इमर्ज था। एक-एक बच्चे की याद नयनों में समाई हुई थी। बाबा ने कहा याद तो सभी बच्चों ने भेजी हैलेकिन इसमें दो प्रकार की याद है। कई बच्चों की याद अव्यक्त है और कईयों की याद में अव्यक्त भाव के साथ व्यक्त भाव मिक्स है। 75 बच्चों की याद अव्यक्त थी लेकिन 25 की याद मिक्स थी। फिर बाबा ने सभी को स्नेह और शक्ति भरी दृष्टि देते गिट्टी खिलाई। फिर एक दृश्य इमर्ज हुआ - क्या देखा सभी बच्चों का संगठन खड़ा है और ऊपर से बहुत फूलों की वर्षा हो रही है। बिल्कुल चारों और फूल के सिवाए और कुछ देखने में नहीं आ रहा था। बाबा ने सुनाया - बच्चीबाप- दादा ने स्नेह और शक्ति तो बच्चों को दी ही है लेकिन साथ-साथ दिव्य गुण रुपी फूलों की वर्षा शिक्षा के रूप में भी बहुत की है। परन्तु दिव्य गुणों की शिक्षा को हरेक बच्चे ने यथाशक्ति ही धारण किया है। इसके बाद फिर दूसरा दृश्य दिखाया - तीन प्रकार के गुलाब के फूल थे एक लोहे कादूसरा हल्का पीतल का और तीसरा रीयल गुलाब था। तो बाबा ने कहा बच्चों की रिजल्ट भी इस प्रकार है। जो लोहे का फूल हैं - यह बच्चों के कड़े संस्कार की निशानी थे। जैसे लोहे को बहुत ठोकना पड़ता हैजब तक गर्म न करोहथोड़ी न लगाओ तो मुड़ नहीं सकता। इस तरह कई बच्चों के संस्कार लोहे की तरह है जो कितना भी भट्टी में पड़े रहें लेकिन बदलते ही नहीं। दूसरे है जो मोड़ने से वा मेहनत से कुछ बदलते हैं। तीसरे वह जो नैचुरल ही गुलाब हैं। यह वही बच्चे हैं जिन्होंने गुलाब समान बनने में कुछ मेहनत नहीं ली। ऐसे सुनाते- सुनाते बाबा ने रीयल गुलाब के फूल को अपने हाथ में उठाकर थोड़ा घुमाया। घुमाते ही उनके सारे पत्ते गिर गये। और सिर्फ बीच का बीज रह गया। तो बाबा बोलेदेखो बच्ची जैसे इनके पत्ते कितना जल्दी और सहज अलग हो गये - ऐसे ही बच्चों को ऐसा पुरुषार्थ करना है जो एकदम फट से पुराने संस्कारपुराने देह के सम्बन्धियों रूपी पत्ते छट जायें। और फिर बीजरूप अवस्था में स्थित हो जायें। तो सभी बच्चों को यही सन्देश देना कि अपने को चेक करो कि अगर समय आ जाए तो कोई भी संस्कार रूपी पत्ते अटक तो नहीं जायेंगेजो मेहनत करनी पड़ेकर्मातीत अवस्था सहज ही बन जायेगी या कोई कर्मबन्धन उस समय अटक डालेगाअगर कोई कमी है तो चेक करो और भरने की कोशिश करो। 
3. आज बाबा को मधुबन में आने के लिए निमन्त्रण देने के लिए गई - तो बापदादा के ईशारों से अनुभव हुआ कि आज बाबा का विचार नहीं है। इतने में ही बाबा बोले अच्छा बच्ची सभी बच्चों ने बुलाया है तो बापदादा बच्चों का सेवाधारी है। यह सुनकर संकल्प चला कि बाबा ने अभी-अभी ना की और अभी-अभी हाँ की क्योंदिल के संकल्प को जानकर बाबा बोले - यह जानबूझ कर कर्म करके बाबा सिखला रहे हैं कि तुम बच्चों को भी एक दो की रायएक दो के विचारों को रिगार्ड देना चाहिए। भल समझो कोई विचार देता है और तुमको नहीं जचता है तो भी उनके विचार को फौरन ठुकरा नहीं देना चाहिए। पहले तो उनको रिगार्ड दो कि हाँक्यों नहीं। बहुत अच्छा। जिससे उनके विचार का फोर्स कम हो जाऐं। तो फिर आप जो उन्हें समझायेंगे वह समझ सकेंगे। अगर सीधा ही उनको कट करेंगे तो दोनों फोर्स टक्कर खायेंगी और रिजल्ट में सफलता नहीं निकलेगी। इसलिए एक दो के विचार अर्थात् राय को पहले रिगार्ड देना आवश्यक है। इससे ही आपस में स्नेह और संगठन चलता रहेगा। 
4. आज जब वतन में गई तो जैसे ही हम पहुँची तो बापदादा सामने थे ही लेकिन क्या देखा कि ब्रह्मा बाबा के गले में ढेर की ढेर मालायें पड़ी हुई थी। फिर बाबा ने कहा यह माला उतार कर देखो। माला उतारी तो कोई बड़ी माला थी कोई छोटी। हमने कहा बाबा इसका रहस्य क्या हैबाबा बोले बच्चीयह सभी के उल्हनों की माला है। क्योंकि हरेक बच्चे जब एकान्त में बैठते हैं तो बाबा को स्नेह में उल्हना ही देते हैं। हरेक बच्चे ने बाप को उल्हनों की माला जरूर पहनाई है। बाबा ने कहा बच्चों को ड्रामा भल याद है लेकिन प्यारे ते प्यारी चीज तो जरूर है। तो अचानक ड्रामा को वंडरफुल देख हरेक बच्चा दिल ही दिल में उल्हना देते रहते हैं। यूँ तो ज्ञान बच्चों को है लेकिन ज्ञान के साथ प्रेम का स्नेह भी है इसलिए इन उल्हनों को गलत नहीं कहेंगे। फिर हमने पूछा बाबाआपने इसका रेसपान्ड क्या दियातो बाबा बोले जैसा बच्चा वैसा रेसपान्ड। बाबा ने कहा मैं भी रेसपान्ड में बच्चों को उल्हनों की माला ही पहनाता हूँ। वह कौन सीफिर बाबा ने सुनाया - जो बाप की आश बच्चों में थी वह साकार रूप में बाप को नहीं दिखलाईजो अब अव्यक्त रूप में दिखलानी है। बाबा ने कहा यह उल्हना भी मीठी रूहरूहान है। यह भी एक खेलपाल बच्चों का है। साकार रूप में जो बापदादा ने श्रृंगार कराया वह अब अव्यक्त वतन में बापदादा देखेंगे। यह सीन पूरी हो गई। फिर भोग स्वीकार कराया फिर मैंने बाबा से पूछा - बाबा आप सारा दिन वतन में क्या करते होबाबा ने कहा चलो मैं तुमको वतन का म्युजियम दिखलाऊँ तुम तो म्युजियम बनाने के पहले प्लैन बनाते हो बाबा का म्युजियम तो एक सेकेण्ड में तैयार हो जाता है। फिर क्या देखाएक बहुत बड़ा हाल था। एक ही हाल में हम बच्चे ढेर की ढेर माडल के रूप में खड़े थे। हमने कहा बाबा यह तो हम ही म्यूजियम में खड़े हैं। बाबा ने कहा - बच्ची बाबा का म्युजियम यही है। अभी तुम जाओ जाकर एक माडल को देखो कि बापदादा ने क्या-क्या सजाया हैजैसे आर्टिस्ट मूर्ति को सजाते हैं तो बाबा ने कहा देखोबापदादा ने क्या-क्या सजाया हैहम जब माडल के पास गई तो हमको कुछ खास दिखाई नहीं पड़ा। पूरी सजी हुई मूर्ति दिखाई पड़ रही थी। बाबा ने कहा जो मोटा श्रृंगार है वह तो साकार में ही बच्चों का करके आये हैं। परन्तु अब अव्यक्त रूप में क्या सजा रहे हैंसभी श्रृंगार तो हैजेवर भी है परन्तु जेवर में बीच में नग लगा रहे हैं। बाबा के कहने के बाद कोई-कोई में जैसे एकस्ट्रा नग दिखाई पड़े। बाबा ने कहा बच्चों के प्रति मुख्य शिक्षा यही है कि अव्यक्त स्थिति में स्थित रहकर व्यक्त भाव में आओ। जब एकान्त में बैठते हैं तो अव्यक्त स्थिति रहती है लेकिन व्यक्त में रहकर अव्यक्त भाव में स्थित रहें वह मिस कर लेते हैं इस- लिए एकरस कर्मातीत स्थिति का जो नग हैवह कम है। तो जिसके जीवन में जो कमी देखता हूँ वह सजा रहा हूँ। जैसे साकार रूप में यह कार्य करता था वही फिर अव्यक्त रूप में करता हूँ। तो बच्चों से जाकर पूछना कि सारे दिन में जैसे बाप बच्चों को सजाते हैंऐसे बच्चों को भासना आती हैउस टाइम जो योंगयुक्त बच्चे होंगे उनको भासना आयेगी कि बाबा अब मेरे से बात कर रहे हैंसजा रहे हैं। जैसे मैं अव्यक्त वतन में बच्चों से मिलताबहलता रहता हूँ। अव्यक्त रूप वाले बच्चे यह अनुभव कर सकते हैं। मैं भी खास समय पर खास बच्चों को याद करता हूँ। ऐसी टचिंग बच्चों को होती ही होगी। मैंने कहा बाबा आप सभी को अव्यक्त वतन में क्यों नहीं बुला लेते? - यहाँ ही बड़ा सेन्टर खोल दो। अभी तो सभी बच्चे उपराम हो गये हैं। बाबा ने कहा यह उपराम अवस्था होनी ही चाहिए। हमेशा तैयार रहना चाहिए। यह भी याद की यात्रा को बल मिलता है। यह उपराम अवस्था सहज याद का तरीका है। अब बच्चों को कहना ज्यादा समय नहीं है। बाबा कभी भी किसको बुला लेंगे।
5. आज जब वतन में गई तो जाते ही अनुभव हो रहा था जैसे कि लाइट के बादलों से क्रास करके वतन में जा रही हूँ। बादलों की लाइट ऐसे लग रही थी जैसे सूर्यास्त होते समय लाली देखने में आती है। जैसे ही वतन में पहुँची तो वहाँ भी ऐसे ही देखा कि लाइट के बादलों के बीच बापदादा का मुखड़ा सूर्य-चन्द्रमा समान चमकता हुआ देखने में आ रहा था। सीन तो बड़ी सुन्दर दिखाई दे रही थी लेकिन आज का वायुमण्डल बिल्कुल शान्त था। बापदादा के मुलाकात में भी शान्ति और शक्ति की भासना आ रही थी। फिर तो मुस्कराते हुए बाबा बोले - भल तुम बच्चे साकार शरीर में साकारी सृष्टि में हो फिर भी साकार में रहते ऐसे ही लाइट माइट रूप होकर रहना है जो कोई भी देखे तो महसूस करे कि यह कोई फरिश्ते घूम रहे हैं। लेकिन वह अवस्था तब होगी जब एकान्त में बैठे अन्तर्मुख अवस्था में रह अपनी चेकिंग करेंगे। ऐसी अवस्था से ही आत्माओं को आप बच्चों से साक्षात्कार होगा। आज वतन में एक तरफ तो बिल्कुल शान्ति थीदूसरे तरफ फिर प्यार का रूप बहुत था। क्या देखाबाबा की बाँहों में सभी बच्चे समाये हुए थे। साथ-साथ प्रेम का सागर तो था ही। बाबा ने कहा - तुम शक्तियों को भी सर्व आत्माओं को ऐसे ही अब अपने समीप लाना है। आपकी दृष्टि में बाप समान जब प्रेम और शक्ति दोनों ही पावर होगी तब आत्मायें नजदीक आयेंगी। इसके बाद बाबा ने तीसरा दृश्य दिखाया-क्या देखा बाबा के सामने ढेर कार्डस पड़े थे। बाबा ने कहा इन कार्डस को ऐसे सजाओं जिससे कोई सीनरी बन जाए क्योंकि हर कार्ड पर सीनरी की डिजाइन थी - किसमें चित्र किसमें शरीर। हम मिलाने लगी तो कभी उल्टा कभी सुल्टा हो जाता था। और बापदादा बहुत हँस रहे थे। उसमें बहुत ही सुन्दर सतयुग की सीनरियॉ थी। एक कृष्ण बाल रूप में झूले में झूल रहा थासाथ में कान्ता (दासी) झुला रही थी। दूसरे में सखे-सखियों का खेल था। मतलब तो सतयुग की दिनचर्या थी। फिर बाबा ने विदाई देते समय कहाबच्ची सबको सन्देश देना - कि शक्ति स्वरूप भव और प्रेम स्वरूप भव। 
6. आज जब इस देह और देह के देश से परे अपने को सूक्ष्मवतन जिसको ब्रह्मापुरी कहते हैं वहाँ गई तो परमात्मा बाप ने एक दृश्य दिखाया - बहुत बड़ी एक भीड़ देखी - फिर देखा जैसे कोई टिकेट बाँट रहा है और हरेक कोशिश कर रहा है कि हमें भी टिकेट मिले। लेकिन थोड़े समय में देखा कि कोई-कोई को टिकेट मिली और कोई-कोई टिकेट से वंचित रह गये। जिनको टिकेट मिली वह दिल ही दिल में हर्षाते रहे और जिन्हें नहीं मिली वह एक दो को देखते रहे। वह टिकेट कहाँ की थी उस पर एक दूसरा दृश्य देखा - एक बड़ा सुन्दर दरवाजा था जो अचानक खुला - जिन्हों के पास टिकेट थी वह तो दरवाजे के अन्दर चले गये और जिनके पास टिकेट नहीं थी वह बड़े ही पश्चाताप से देख रहे थे। उस गेट पर लिखा हुआ था - ' 'स्वर्ग का द्वार ''। बाबा ने रहस्य सुनाया - कि परमात्मा बाप सभी बच्चों द्वारा सतयुगी नई सृष्टि स्वर्ग में चलने की टिकेट दिला रहे हैं। परन्तु कई बच्चे सोच रहे हैं कि अब नहीं बाद में ले लेंगे। लेकिन ऐसे न हो कि यह टिकेट मिलना बन्द हो जाए और स्वर्ग में जाने से वंचित हो जायें। बाबा ने कहा - कई आत्मायें सुनती हैंसोचती हैं कि यह कार्य क्या चल रहा हैतो बापदादा बच्चों प्रति यही शिक्षा दे रहे हैं कि यह जो समय आने वाला हैआप जो अब सोच रहे होसोचते-साचते अपने भाग्य को गंवा न दो। यह दृश्य दिखाया। फिर दूसरी सीन देखी कि नदी बह रही थी - उस नदी में दूर-दूर से कई लोग आकर स्नान कर रहे थे। कई फिर वहाँ ही नजदीक थे लेकिन नहा नहीं रहे थे। बल्कि उनसे कई पूछ रहे थे कि नदी कहाँ हैं हम जाकर स्नान करें लेकिन जो नजदीक रहने वाले थे उनको नदी में स्नान करने का महत्व नहीं था और जो प्यासे थेउनको भी उस प्यास का मूल्य कम कराते थे। फिर बाबा ने कहा कि बच्ची यह जो ज्ञान गंगा है। गंगा के नजदीक वाले आबू निवासी हैं। दूर दूर से आकर तो इसमें स्नान करते हैं लेकिन यहाँ वाले इस महत्व को न जान उनको टालते हैं। तो कहाँ ऐसे न हो इस भूल में रह जायें इसलिए बापदादा के सब बच्चे हैंभल आज्ञाकारी बच्चे नहीं हैं फिर भी बच्चे तो बाबा के प्रिय हैं। तो बच्चों को बाबा शिक्षा देते हैं कि यह अमूल्य समय जो ज्ञान गंगा में नहाने का मिल रहा हैवह कभी गंवा न देना। फिर थोड़े समय में देखा कि कईयों ने तो स्नान कियाकईयों ने जल को भरकर रखा लेकिन कुछ समय के बाद नदी ने रास्ता पलट लिया और जिन्होंने नहीं नहायान भरकर रखा वह औरों से एक-एक बूंद मांग रहे थेतड़फ रहे थे। तो बाबा ने कहा यह समय अभी आने वाला है। फिर बाबा ने सभी बच्चों के प्रति एक महामन्त्र की सौगात दी - बाबा बोलेएक तो मुझ परमपिता की याद में रहो और अपने जीवन को पवित्र और योगी बनाओ। यही बापदादा ने स्नेह के रिटर्न में महामन्त्र की सौगात सभी प्रति दी। 
7. आज जब वतन में गई तो जाते ही क्या देखा कि शिवबाबा और अपना ब्रह्मा बाबा दोनों आपस में बैठे थे और सामने जैसे एक छोटी पहाड़ी बनी हुई थी। वह किसकी थीक्या देखा कि ढेर के ढेर पत्र थे। इतने पत्र थेइतने पत्र थे जैसे कि पहाड़ियां बन गई थी जैसे ही हम पहुँची तो ब्रह्मा बाबा ने हमको देखा और कहा कि ईशू कहाँ है। इतने पत्र हो गये हैं। मैंने कहा बाबा मैं आई हूँ। कहा ईशू बच्ची को भी साथ लाई हो ना! देखना ईशू बच्चीमैं दो मिनट में इतने सारे पत्र पूरा कर देता हूँ। शिव बाबा तो साक्षी होकर मुस्करा रहे थे। इतने में देखा कि ईशू बहन भी वहाँ इमर्ज हो गई। ईशू का चेहरा बिल्कुल ही शान्त था। बाबा ने कहा बच्ची क्या सोच रही होआज तो पत्र का जवाब देना है। उसी समय जैसे साकार वतन का संस्कार पूर्ण रीति इमर्ज था। मम्मा खड़ी होकर देख रही थी। इतने में ही शिव बाबा ने ब्रह्मा बाबा को कहा आप कहाँ होवतन में बैठे होफिर एक सेकेण्ड में ही रूप बदल गया। बाबा ने कुछ कहा नहींएकदम डेड साइलेन्स हो गये। इतने में बाबा ने मुझे कहा कि बच्ची यह पत्र खोलकर देखो। मैंने कहा बाबा पत्र तो ढेर हैं। बाबा ने कहा बच्ची इसमें तो एक सेकेण्ड लगेगा। क्योंकि सभी में एक ही बात है। इसके बाद बाबा ने सुनाया कि सभी पत्रों में बच्चों के उल्हने ही हैं। पत्रों में सभी उल्हने ही थे। अब देखना बाबा बच्चों को रेस्पाण्ड करते हैं। देखना एक सेकेण्ड में मैं सभी को जवाब दे देता हूँ। फिर बाबा ने सभी पत्रों का लाल अक्षरों में यहाँ माफिक ही पत्र लिखा। पत्र में क्या था - "ब्राह्मण कुल भूषणस्वदर्शनचक्रधारीये रत्नों बच्चों प्रतिसमाचार यह है कि सभी बच्चों के उल्हनों के पत्र सूक्ष्मवतन में पाये। रेस्पान्ड में बापदादा बच्चों को कह रहे हैं कि ड्रामा की भावी के बन्धन में सर्व आत्मायें बंधी हुई हैं। सभी पार्ट बजा रही हैं। उसी ड्रामा के मीठे-मीठे बन्धन अनुसार आज अव्यक्त वतन में पार्ट बजा रहा हूँ। सभी बच्चों को दिल व जान सिक व प्रेम से अव्यक्त रूप से याद प्यार बहुत-बहुत-बहुत स्वीकार हो। जैसे बाप की स्थिति है वैसे बच्चों को स्थिति रखनी है"। यह है बापदादा का पत्र। फिर बाबा को हमने भोग स्वीकार कराया। बाबा बोले बच्ची आज कुछ नये बच्चे भी आये हैं। पहले मैं उन्हों को खिलाता हूँ। फिर वतन में बाबा ने सभी बच्चों को इमर्ज कर अपने हस्तों से जल्दी-जल्दी एक एक दृष्टि भी दे रहे थेहाथों से गिट्टी भी खिला रहे थे। लेकिन एक एक को एक सेकेण्ड भी जो दृष्टि दे रहे थेउस दृष्टि में बहुत कुछ भरा हुआ था। उसके बाद फिर तीसरा दृश्य हमने देखा। बाबा को कहा कि सभी ने एक प्रश्न पूछने के लिए कहा है। बाबा ने कहा जो भी प्रश्न हैं वह पूछ सकते हो। बाबा तो एक अक्षर में जवाब दे देगा।

प्रश्न:-सभी पूछते हैं कि पिछाड़ी के समय आप ने कुछ बोला नहीं। बाहर की सीन तो हम सभी ने सुनी है लेकिन अन्दर क्या था वह अनुभव भी सुनना चाहते हैं। बाबा बोलेहाँ बच्चीक्यों नहीं। अपना अनुभव सुनायेंगे। अच्छा लो सुनो -
बच्ची खेल तो सिर्फ 10-15 मिनट का ही था। उस थोड़े से समय में ही अनेक खेल चले। उसमें भिन्न-भिन्न अनुभव हुए। पहला अनुभव तो यह था कि पहले जोर से युद्ध चल रही थी। किसकी? योगबल और कर्मभोग की। कर्मभोग भी फुल फोर्स में अपने तरफ खींच रहा था और योगबल भी फुल फोर्स में ही था। ऐसे अनुभव हो रहा था कि जो भी शरीर के हिसाब-किताब रहे हुऐ थे वह फट से योग अग्नि में भस्म हो रहे थे। और मैं साक्षी हो देख रहा हूँ, जैसे अखाड़े में बैठ मल्लयुद्ध देखते हैं। मतलब तो दोनों का फोर्स पूरा ही था। उसके बाद बाबा बोले कि कुछ समय बाद कर्मभोग (दर्द) तो बिल्कुल निर्बल हो गया। बिल्कुल दर्द गुम हो गया। ऐसे ही अनुभव हो रहा था कि आखरीन में योगबल ने कर्मभोग पर जीत पा ली। उस समय तीन बातें साथ-साथ चल रही थी वह कौन सी? एक तरफ तो बाबा से बातें कर रहा था कि बाबा आप हमें अपने पास बुला रहे हो। दूसरे तरफ यूँ तो कोई खास बच्चों की स्मृति नहीं, लेकिन सभी बच्चों के स्नेह की याद शुद्ध मोह के रूप में थी बाकी शुद्ध मोह की रग वा यह संकल्प कि छुट्टी नहीं ली वा और कोई भी संकल्प नहीं था। तीसरी तरफ यह भी अनुभव हो रहा था कि कैसे शरीर से आत्मा निकल रही है। कर्मातीत न्यारी अवस्था जो बाबा ने पहले मुरली भी चलाई कि कैसे भाँ भाँ होकर सन्नाटा हो जाता है। वैसे ही बिल्कुल डेड साइलेन्स का अनुभव हो रहा था और देख रहा था कि कैसे एक-एक अंग से आत्मा अपनी शक्ति छोड़ती जा रही है। तो कर्मातीत अवस्था की मृत्यु क्या चीज है वह अनुभव हो रहा था। यह है मेरा अनुभव। फिर हमने बाबा को कहा कि बाबा सभी बच्चे कहते हैं अगर हम सभी सामने होते तो बाबा को रोक लेते। तो बाबा ने कहाँ बच्ची रोक लेते तो यह ड्रामा कैसे होता। फिर हमने कहा बाबा यह सीन जैसे अब तो आर्टीफिशियल लग रही है। रीयल ड्रामा नहीं लगता। बाबा ने कहा कि बच्ची यह स्नेह की मीठी तार जुटी होने के कारण तुमको अन्त तक यह वण्डर ही देखने में आयेगा और अब तक भी तो सम्बन्ध है। भल साकार रथ गया है लेकिन ब्रह्मा के रूप में अव्यक्त पार्ट बजा रहे हैं। बाबा ने कहा मैं भी कभी साकार वतन में चला जाता हूँ फिर शिव बाबा पूछते हैं कहाँ बैठे हो? यहाँ बैठे जैसे साकार वतन में। यह मकान बन रहा है वहाँ तक जाता हूँ। मैंने कहा बाबा, कभी कभी लगता है कि जैसे बाबा चक्र लगा रहे हैं। बाबा ने कहा मैं चक्कर लगाता हूँ तो वह भासना तो बच्चों को आयेगी ही। मतलब तो रूह रूहान हो रही थी। फिर बाबा ने एक दृश्य दिखाया जैसे एक चक्र के अन्दर बहुत चक्र दिखाई पड़े। चक्र का ढंग ऐसे बनाया था कि उस चक्र से निकलने के 4-5 रास्ते दिखाई पड़े परन्तु निकल न पाये। सिर्फ ब्रह्मा बाबा का यह दिखाया कि चक्र में चलते-चलते प्याइन्ट (जीरो) पर खड़े हो गये, निकले नहीं। बाबा ने सम- झाया कि यह है ड्रामा का बन्धन। ब्रह्मा भी ड्रामा के सर्कल से निकल नहीं सकते। ड्रामा के बन्धन से कोई भी निकल नहीं सकते। उस जीरो प्याइन्ट तक पहुँच गये लेकिन फिर भी ड्रामा का मीठा बन्धन है। जिस मीठे बन्धन को खेल के रूप में दिखाया। फिर मिश्री बादामी खिलाई। छुट्टी दी, बोला, जाओ बच्ची टाइम हो गया है। 
8. आज जब वतन में गई तो कोई भी नजर नहीं आ रहा था। दूर से कोई जैसे आवाज आ रही थी - ऐसे लग रहा था जैसे कोई खास कार्य हो रहा हो। मैं पहले तो कुछ रूकी लेकिन फिर आगे चलकर क्या देखा - शिवबाबा ब्रह्मा बाबामम्मा और विश्वकिशोर चारों ही आपस में बातचीत कर रहे थे और बहुत प्लैन उनके आगे रखे थे। जिसमें कुछ निशान आदि दिखाई दे रहे थे। लेकिन समझ में नहीं आया। मम्मा सभी बच्चों का हालचाल पूछ रही थी। मैंने कहा मम्मा आपने बाबा को भी बुला लिया। मम्मा बोली - मम्मा भी नहीं चाहती कि बच्चों से मात-पिता का साकारी साथ छूटे लेकिन ड्रामा। फिर मैंने बाबा से पूछा - बाबा यह प्लैन्स आदि क्या हैंबाबा बोले - बच्चीजैसे मार्शल के पास सारे नक्शे रहते हैं कि कहाँ-कहाँ क्या-क्या हो रहा है। आगे क्या होना है - वैसे यह भी स्थापना के कार्य की ही बातचीत चल रही थी। जो फिर सुनायेंगे। इसके बाद एक दृश्य दिखाया - जिसमें तीन संगठन थे। एक तो देखा लाल-लाल चीटियाँ जो आपस में गेंद के माफिक इक्ट्ठी हो जा रही थी। दृश्य ऐसा था जो ब्रह्मा बाबा ने शुरू-शुरू में देखा था -दूसरा संगठन था मूलवतन में आत्मायें शमा रूप में थी तीसरा संगठन - हम ब्राह्मणों का था। जो सभी सर्किल रूप में बैठे थे और बीच में बापदादा थे। वह ऐसे लग रहा था जैसे फूल के बीच में बूर होता है और चारों ओर पत्ते होते हैं। इसका रहस्य बाबा ने बताया - कि बच्ची जब प्रत्यक्षता शुरू हुई तो भी संगठन में देखा। अन्त में भी आत्माओं को संगठन रूप में ही रहना है और अब मध्य में भी संगठन है। संगठन की शक्ति है तो कोई भी हिला नहीं सकता। देखोबापदादा ने कहाँ-कहाँ से चुन-चुनकर संगठन बनाया है। तो बच्चे भी जब संगठन में चलेंगे तो माया का वार नहीं होगा। जैसे गुलाब का फूल वा कोई भी फूल होता है तो उनको योग्य स्थान पर रखेंगे और अकेला पत्ता होगा तो हाथ से जल्दी मसल देंगे। तो बच्चों का भी संगठन रूपी गुलदस्ता होगा तो विजय प्राप्त करते रहेंगे। कोई वार नहीं कर सकेगा। ऐसे कहते बाबा ने कहा कि सभी बच्चों को कहना कि संगठन ही सेफ्टी का साधन है।
9. आज जब वतन में गई तो बापदादा दोनों बहुत बिजी थे। क्या देखा - दोनों के आगे बहुत से फूल भी थे और पत्ते भी थे। जैसे गुलदस्ते में फूल भी डाले जाते और पत्ते भी डाले जाते। फूल दो तीन प्रकार के अलग-अलग थेउनको देख रहे थे और छांट रहे थे। तो बाप-दादा दोनों उसी ही कार्य में बिजी थे। मुझे देखा भी नहीं। जब मैं नजदीक गई तो मुझे देख मुस्कराया - और कहा कि मैं सारा दिन बिजी रहता हूँ। देखो बच्ची कितनी बड़ी कारोबार चल रही है। यह फूल पत्ते तीन क्वालिटी के अलग-अलग करके रखे हैं। पहले बाबा ने मुझे फूल दिखाये जिनकी संख्या बहुत कम थी फिर बीच की क्वालिटी दिखाई जिसमें फूल बहुत थे लेकिन साथ में थोड़े पत्ते भी लगे थे। फूल अच्छे थे लेकिन जो पत्ते लगे हुए थे वह कुछ डिफेक्टेड थे। तीसरी क्वालिटी में फिर पत्ते जास्ती थे और फूल बहुत ही कम थे। इस पर बाबा ने मुझे समझाया कि यह पहली क्वालिटी जिसमें थोड़े फूल हैं - यह वह बच्चे हैं जो बिल्कुल दिल पर चढ़े हुए हैं और ऐसे दिल वाले अनन्य बच्चे बहुत ही थोड़े हैं। दूसरे नम्बर वाले बच्चे हैं बहुत अच्छेपरन्तु थोड़ा कुछ कमी है। फूल बने हैं लेकिन थोड़ी कमी है। बाकी तीसरी क्वालिटी के हैं प्रजा। उनमें कोई फूल निकलता है जो पीछे जाने वाला है। बाकी सब हैं प्रजा। तो दो ऊपर की क्वालिटी बच्चों की है। बापदादा अब गुलदस्ता सजाते हैं। जब गुलदस्ता सजाया जाता है तो सिर्फ फूल डालने से गुलदस्ता नहीं शोभता। उसमें कुछ पत्ते भी चाहिए। तुम फूल हो लेकिन तुम्हारे साथ पत्ते भी चाहिए। तुम राजा बनेंगे तो प्रजा भी चाहिए ना। तो प्रजा रूपी पत्तों के बीच में फूल शोभता है। तो यहाँ बैठे तुम बच्चों का गुलदस्ता बनाता हूँ। और देखता हूँ कि एक फूल ने कितनी प्रजा बनाई है। जिसने जास्ती प्रजा बनाई है उनका गुलदस्ता भी शोभता है। फिर बाबा ने एक प्रश्न पूछा- कि जब कोई देवता पर फूल चढ़ाते हैं तो सिर्फ फूल चढ़ाते पत्ते निकाल देते हैं क्योंपत्ते तो फूल का शो होते हैं फिर पत्ते क्यों निकाल देतेफिर बाबा ने सुनाया कि तुम बच्चों से ही यह सारी रसम-रिवाज होती है। जब तुम पहले अर्पण हुए तो अकेले थे लेकिन फूल को अगर कुछ समय रखना हो तो पत्ते साथ में होंगे तो रख सकेंगे वैसे ही जब तुम पहले अर्पण हुए तो तुम अकेले फूल अर्पण हुए हो। फिर तुमको 21 जन्मों के लिए अविनाशी चलना है - तो प्रजा रूपी पत्ते भी लगाये जाते हैं। पहले तुम आये तो प्रजा नहीं थी लेकिन अब तो तुम फूलों की शोभा ही प्रजा रूपी पत्तों से है इसलिए बापदादा कहते हैंप्रजा बनाओ। 
10. आज जब मैं वतन में गई तो ऐसे लगा जैसे कोई सूर्य के नजदीक जाए तो सूर्य की गर्मा- इस या सकाश तेज आती हैऐसे ही आज वतन में जैसे ही आगे बढ़ते गये तो ऐसे अनुभव हुआ जैसे कोई भट्टी के आगे जाते हैं। आज बाबा लाल-लाल लाईट में जैसे अव्यक्त फीचर में दिखाई दे रहे थे और सूर्य के समान किरणें निकल रही थी। क्या देखा कि नीचे बहुत बड़ी सभा है। ऐसी सभा साकार रीति में ब्राह्मणों की कभी नहीं थी - सभी ब्राह्मणों पर वह किरणें जा रही थी। और मैं भी वतन में गई तो देखा मेरे पर भी वह किरणों की लाइट माइट आ रही है। कुछ समय बाद - मैं बाबा से उसी रूप में मिली और कहा कि बाबा मैं भोग लेकर आई हूँ। बाबा भोग स्वीकार करते हुए सिखला रहे थे कि खाते समय कैसे लाइट माइट की स्थिति में रहना है। फिर मैंने बाबा से पूछा कि बच्चों को याद-प्यार तो देंगे ना। इस पर बाबा ने कहा कि स्नेह का रूप तो बहुत देखा लेकिन स्नेह के साथ शक्ति रूप की स्थिति जो बाबा बच्चों की बनाने चाहते हैंवह अभी तक कम है। तो आज बाबा स्नेह के साथ शक्ति भर रहे थे। और कहा इसी से ही सर्विस में सफलता होगी। बाबा ने सन्देश भी यह दिया कि सिर्फ स्नेह नहीं लेकिन साथ में शक्ति भी भरनी है। जो बाबा ने खुद दृश्य में दिखाया कि बच्चों को इस सृष्टि को लाइट-माइट की किरणें देनी है। इतने दिन बाबा का स्नेह के रूप से मिलन था लेकिन आज स्नेह के साथ लाइट-माइट का रूप था तो मैं उसे लेने में ही तत्पर हो गई और वापस साकार वतन में आ गई।
11. आज जब मैं वतन में गई तो जैसे एक सभा लगी हुई थी - क्लास हो रहा था। पहले तो मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी। बापदादा ने नयनों से स्वागत किया। फिर बोले बच्ची इन सबसे मुलाकात करो और यह भोग सभी को खिलाओ। तो क्या देखा - जो आत्मायें एडवांस में शरीर छोड़कर गई हैं उन सभी को इमर्ज कर बाबा क्लास करा रहे थे। फिर सभी को मधुबन का ब्रह्मा भोजन स्वीकार कराया। उस संगठन में सभी गई हुई आत्मायें थी। फिर मैंने एक दृश्य देखा - बहुत मकान बन रहे थे। और जैसे मकान में जब छत पड़ती है तो उसको बहुत आधार देते हैं फिर जब सीमेन्ट पक्का हो जाता है तो वह आधार लकड़ी पट्टी आदि निकाल देते हैं। तो इस तरह मकान बनने की छत भरने की कारोबार बहुत जोर शोर से चल रही थी। तो मैं इस मकान को देखती रही और बाबा गायब हो गया। बाबा ने यह दिखाया कि मकान बनाने के लिए पहले आधार दिया जाता है फिर आधार निकाला जाता है। ऐसे ही दृश्य देखते यहाँ पहुँच गई।
12. आज जब मैं वतन में गई तो बाबा नहीं दिखाई दिये। थोड़ी देर के बाद बाबा को देखा तो मैंने पूछा आप कहाँ गये थेबाबा बोले - आज गुरूवार का दिन है तो सभी बच्चों के पास चक्र लगाने गये थे। वैसे तो साकार रूप में इतने थोड़े समय में सब जगह नहीं पहुँच सकता था। अब तो अव्यक्त वतन में अव्यक्त विमान द्वारा राकेट से भी जल्द पहुँच सकते हैं। हमने कहा बाबा आपने चक्र लगाया तो उसमें आपने क्या देखा! बाबा ने कहा - मैजारटी बच्चे अभी तक स्नेह में अच्छे चल रहे हैं और बहुत ऐसे भी हैं जिन्हों के अन्दर कुछ संकल्प भी है कि ना मालूम अब क्या होगा। परन्तु संगठन के सहारे अब तक ठीक हैं। बाबा ने कहा कि स्नेह के आधार पर जो बच्चे अभी तक ठहरे हुए हैं तो अब स्नेह के साथ ज्ञान का फाउन्डेशन जरा भी ढीला हुआ तो बच्चों पर वायुमण्डल का असर बहुत सहज हो सकता है। इसलिए हर एक बच्चे को अपनी चेकिंग करनी है। फिर भी व्यक्त देह में हो तो स्नेह में पहले फोर्स अच्छा रहता है लेकिन इस स्नेह पर फिर जैसे-जैसे दिन पड़ते जायेंगे तो वायुमण्डल का असर जल्दी पड़ सकता है। स्नेह में भल कहते हैं कि शिवबाबा कल्याणकारी है या बाबा ने जो किया है वह ठीक है। स्नेह के वश संकल्प बन्द किया है। स्नेह की रिजल्ट मैजारटी की अधिक है। वायुमण्डल का असर हमारे पर न हो और हमारा असर वायुमण्डल पर हो तब कायदेमुजीब चल सकते हैं। हमने कहा कि बाबा हमारे पास तो ज्ञान की ही बातें चलती हैं। तब बाबा ने कहा बच्चीज्ञान के फाउन्डेशन से अपने को सन्तुष्ट रखेंऐसे बच्चे थोड़े हैं। तो आज बाबा ने यह रिजल्ट बताई और कहा कि सभी को जाकर सुनाना कि वायुमण्डल को हमें चेंज करना है न कि वायुमण्डल हमें चेंज करे। फिर भोग स्वीकार कराने के बाद बाबा ने एक सीन दिखाई - एक बहुत बड़ा हाल थाउस हाल में चारों ओर से बहुत बदबू आ रही थी। उस कमरे में दो तीन बहुत अच्छी खुशबूदार अगरबत्ती जल रही थी। धीरे-धीरे अगरबत्ती की खुशबू ने बदबू को दबा दिया। बाबा ने सुनाया देखो बच्चीचारों तरफ बदबू का वायुमण्डल था लेकिन इतनी सी अगरबत्ती ने वायु- मण्डल को बदल दिया। तो तुम बच्चों पर जब देखो कि वायुमण्डल का असर होता है तो अग-रबत्ती का मिसाल सामने रखो कि हम सर्वशक्तिवान बाप के बच्चे हैं। अगर वायुमण्डल का असर हमारे पर आये तो इससे तो अगरबत्ती अच्छी है। जब तुम बच्चे पावरफुल खुशबूदार बनेंगे तब यह वायुमण्डल दब जायेगा। बाबा ने कहा अब हरेक बच्चे को शिक्षा तो मिली है। शिक्षा भी सभी बड़े मीठे रूप से सुनते हैं। लेकिन जैसे मीठे रूप से सुनते हो उसी मीठे रूप से धारण भी करना है। मीठापन चिपकता बहुत जल्दी है। जो ऐसे मीठा बनेंगे तो बाप से चिपक जायेंगे। याद और मीठापन नहीं होगा तो अलग-अलग रहेंगे। जैसे नमकीन चीज आपस में कभी नहीं मिलती है। तो जो ऐसे होंगे उनकी अवस्था योगयुक्त नहीं रहेगी। अब जैसे बच्चों ने सुना वैसे ही धारण करेंगे तो बहुत बल मिलेगा। 
13. आज जब मैं वतन में गई तो बाप और दादा दोनों सामने खड़े थे। और जाते ही नयनों की मुलाकात से सभी की जो यादप्यार ले गई थी वह दी। जैसे ही मैं याद दे रही थी तो साकार बाबा ने मेरा हाथ पकड़ा। उस हाथ पकड़ने में ना मालूम क्या जादू था - ऐसे अनुभव हुआ जैसे सागर में कोई स्नान करता हैऐसे थोड़े समय के लिए मैं प्रेम के सागर में लीन हो गई। उसके बाद हमने आलमाइटी बाबा की तरफ देखा। तो बाबा ने कहा बच्ची-बाप में मुख्य दो गुण जो हैं वह बच्चों ने साकार रूप में अनुभव किया है। वह दो गुण कौन से हैंजितना ही ज्ञान स्वरूप उतना ही प्रेम स्वरूप। तो बच्चों को भी यह दो गुण अपने हर चलन में धारण करने हैं। फिर मैंने बाबा से पूछा कि पहले वतन में जो गये हुए बच्चों का इतना संगठन था इसका रहस्य क्या था! बाबा ने कहा पूरा राज तो बाद में चलकर सुनायेंगे लेकिन साकार रूप से जो कोई सर्विस अर्थ या कुछ हिसाब किताब चुक्तू करने अर्थ चले गये हैं उन बच्चों से मुलाकात करने के लिए बुलाया था। बाबा उनसे हालचाल पूछ रहे थे कि कौन-कौनकिस रीति से किस रूप से क्या-क्या कर रहे हैं। हमने कहा बाबायह किस रूप से स्थापना के कार्य में बिजी हैंतो बाबा बोले बच्ची यह आगे चलकर स्पष्ट करेंगेफिर भी शार्ट में सुनाते हैं। बाबा ने कहा - बच्ची जब लड़ाई होती है तो किसी भी लश्कर को जब जीतना होता है तो सिर्फ एक तरफ से नहीं चारों तरफ से लश्कर भेजकर पूरा घेराव डाल देते हैं। इस संगठन से यह मालूम हुआ कि जो भी बच्चे गये हैं वह चारों और फैल गये हैं। अभी चारों तरफ स्थापना की नीव पड़ गई है। बाकी अब आर्डर देने की जरूरत है।
फिर बाबा ने चार स्टेजेस की एक सीढ़ी दिखाई। पहली स्टेज दिखाई - ज्ञान सुननासोचना- समझना और निश्चय करना। कोई सोच करता हैकोई मंथन करता है। दूसरी स्टेज बताई - कि अन्त समय कैसे विनाश हो रहा है। कहाँ बाढ़ से डूब रहे हैंकहाँ क्या हो रहा है लेकिन शक्ति दल और पाण्डव बिल्कुल अडोल खड़े थे। तीसरी स्टेज दिखाई कि आत्मायें जैसे निकल कर परमधाम में गुब्बारे माफिक जा रही हैं। फिर परमधाम की सीन भी बाबा ने दिखाई। चौथी सीन - स्वर्ग की दिखाई। स्वर्ग में आत्मायें कैसे छोटे-छोटे बच्चों में प्रवेश हो रही हैं। तो यह सभी स्टेजेस सीढ़ी के चित्र के रूप में दिखाई। यह सीढ़ी दिखाने का रहस्य बताते हुए बाबा ने कहाबच्चों की बुद्धि में यह घूमता रहे कि अब हमारी क्या स्टेज है। जो अन्तिम स्टेज धारण करनी है वह लक्ष्य पहले से ही बुद्धि में रखेंगे तो पुरूषार्थ तेज चलेगा। विनाश के समय की जो सीन दिखाई उसमें आप बच्चों की अडोल अवस्था रहे। फिर बाबा ने हमें ढेर हीरे हाथ में दिये और कहा इन हीरों का टीका सभी बच्चों को लगाना। यह हीरे क्यों दे रहा हूँक्योंकि हीरे मिसल आत्मा मस्तक में रहती हैं। तो हरेक आत्मा सच्चा हीरा बन चमकती रहे।
अच्छा !