Tuesday, 8 October 2019

Hindi Avyakt Vani 13/03/1969

13-03-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

प्रेम और शक्ति के गणों की समानता” 
आत्म-अभिमानी हो याद की यात्रा में बैठे होयाद की यात्रा में भी मुख्य किस गुण में स्थित होयाद की यात्रा में होते हुए भी मुख्य किस गुण स्वरूप होइस समय आप का मुख्य गुण कौन सा है? (सभी ने अपना-अपना विचार सुनाया) इस समय तो सभी विशेष प्रेम स्वरूप की स्थिति में हैं। लेकिन प्रेम के साथ-साथ वर्तमान समय की परिस्थितियों के प्रमाण जितना ही प्रेम स्वरूप उतना ही शक्ति स्वरूप भी होना चाहिए। देवियों के चित्र देखे हैं - देवियों के चित्र में मुख्य क्या विशेषता होती हैअपने चित्रों को कब ध्यान से देखा नहीं हैजब देवियों के चित्र बनाते हैं। काली के सिवाए बाकी जो भी देवियाँ हैं उन्हों के नयन हमेशा गीले दिखाते हैं। प्रेम में जैसे डूबे हुए नयन दिखाते हैं और साथ-साथ जो उनका चेहरा आदि बनाते हैं तो उनकी सूरत से ही शक्ति के संस्कार देखने में आते हैं। लेकिन नयनों में प्रेमदयाशीतलता देखने में आती है। मातापन के प्रेम के संस्कार इन नयनों से दिखाई पड़ते हैं। उन्हों के ठहरने का ढंग वा सवारी अस्त्र-शस्त्र दिखाते हैं, वह शक्ति रूप प्रगट करता है। तो ऐसे ही आप शक्तियों में भी दोनों गुण समान होने चाहिए। जितना शक्ति स्वरूप उतना ही प्रेम स्वरूप। अभी तक दोनों नहीं हैं। कभी प्रेम की लहर में कभी शक्ति रूप में स्थित रहते हो। दोनों ही साथ और समान रहे। यह है शक्तिपन की अन्तिम सम्पूर्णता की निशानी। अभी बापदादा को अपने बच्चों के मस्तक में क्या देखने में आता हैअपने मस्तक में देखा है क्या हैप्रारब्ध देखते हो वा वर्तमान सौभाग्य का सितारा चमकता हुआ देखते हो वा और कुछ? (हरेक ने अपना-अपना विचार सुनाया) तीनों सम्बन्धों से तीनों ही बातें देखने में आती हैं। इसीलिए आपको त्रिशूल सौगात भेजी थी। तीनों ही सितारे दिखाई दे रहे हैं। एक तो भविष्य कादूसरा वर्तमान सौभाग्य का और तीसरा जो परम- धाम में आपकी आत्मा की सम्पूर्ण अवस्था होनी हैवह आत्मा की सम्पूर्ण स्थिति का सितारा। तीनों ही सितारे दिखाई पड़ते हैं। इन तीनों सितारों को देखते रहना। कभी -कभी सितारों के बीच बादल आ जाते हैं। कभी-कभी सितारे जगह भी बदली करते हैं। कभी टूट भी पड़ते हैं। यहाँ भी ऐसे जगह भी बदली करते हैं। कभी टूट भी पड़ते हैं। कभी देखो तो बहुत ऊपरकभी देखो तो बीच मेंकभी देखो तो उससे भी नीचे। जगह भी अभी बदली नहीं करनी चाहिए। अगर बदली करो तो आगे भल बढ़ो। नीचे नहीं उतरो। अविनाशी सम्पूर्ण स्थिति में सदैव चढ़ते रहो। ऐसा सितारा बनना है। टूटने की तो यहाँ बात ही नहीं। सभी अच्छे पुरुषार्थी बैठे हुए हैं। बाकी जगह बदली की आदत को मिटाना है।
कुमारियों की रिजल्ट कैसी हैआप अपनी रिजल्ट क्या समझती होविशेष किस बात में उन्नति समझती हो? (हरेक ने अपना सुनाया) याद की यात्रा में कमी है। इसलिए इतनी महसूसता नहीं होती। अमृतवेले याद का इतना अनुभव नहीं होता है इसलिए जैसे साकार में यहाँ बाहर खुली हवा में सैर भी कराते थेलक्ष्य भी देते थेयोग का अनुभव भी कराते थे। इसी रीति जो कुमारियों के निमित्त टीचर्स हैं वह उन्हों को आधा घण्टा एकान्त में सैर करावे। जैसे शुरू में तुम अलग-अलग जाकर बैठते थेसागर के किनारेकोई कहाँकोई कहाँ जाकर बैठते थे। ऐसी प्रैक्टिस कराओ। छतें तो यहाँ बहुत बड़ी-बड़ी हैं। फिर शाम के समय भी 7 से 7:30 तक यह समय विशेष अच्छा होता है। जैसे अमृतवेले का सतोगुणी टाइम होता है वैसे यह शाम का टाइम भी सतोगुणी है। सैर पर भी इसी टाइम निकलते हैं। उसी समय संगठन में योग कराओ और बीच-बीच में अव्यक्त रूप से बोलते रहोकोई का बुद्धियोग यहाँ वहाँ होगा तो फिर अटेन्शन खैचेगा। योग की सबजेक्ट में बहुत कमी है। भाषण करनाप्रदर्शनी में समझाना यह तो आजकल के स्कूलों की कुमारियों को एक सप्ताह ट्रेनिंग दे दो तो बहुत अच्छा समझा लेंगी। लेकिन यह तो जीवन में अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करना है ना। उसी समय ऐसे समझो जैसे कि बापदादा के निमन्त्रण पर जा रहे हैं। जैसे बापदादा सैर करने आते हैं वैसे बुद्धियोग बल से तुम सैर कर सकती हो। जब याद की यात्रा का अनुभव करेंगे तो अव्यक्त स्थिति का प्रभाव आपके नयनों सेचलन से प्रत्यक्ष देखने में आयेगा। फिर उन्हों से माला बनवायेंगे। जैसे शुरू में आप खुद माला बनाती थी ना।
इस ग्रुप को उमंग उत्साह अच्छा है। बाकी एक बात खास ध्यान में रखनी है - कि एक दो के सस्कारों को जान करकेएक दो के स्नेह में एक दो से बिल्कुल मिल-जुल कर रहना है। जैसे कोई से विशेष स्नेह होता है तो उनसे कितना मिक्स हो जाते हैं। ऐसे ही सभी को एक दो में मिक्स होना चाहिए। जब कुमारियाँ ऐसा शो करके दिखायेंगी तब फिर और भी बुनमारियॉ सर्विस करने के निमित्त बनेगी। और जो निमित्त बनता है उनको उसका फल भी मिल जाता है। आप शोकेस हो अनेक कुमारियों को उमंग और उत्साहउन्नति में लाने की। जितना ही उमंग से साकार - निराकार दोनों ने मिलकर यह प्रोग्राम बनाया है उतना ही इसका उजूरा दिखाना है। कई कुमारियों की उन्नति के निमित्त बन सकती हो। अपनी हमजिन्स को गिरने से बचा सकती हो। बुनमारियों के साथ बापदादा का काफी स्नेह है। क्योंकि बापदादा परमपवित्र है और कुमारियाँ भी पवित्र है। तो पवित्रतापवित्रता को खींचती है। वर्तमान समय मुख्य विशेषता यही चाहिएहरेक महारथी का फर्ज है अपना गुण औरों में भरना। जैसे ज्ञान का दान देना होता है वैसे गुणों का भी दान करना चाहिए। जैसे ज्ञान रत्नों का दान करते हो इसलिए महारथी कहलाये जाते होवैसे गुणों का दान भी बहुत बड़ा दान है। ज्ञान देना तो सहज है। गुणों का दान देनाइसमें जरा मेहनत है। गुणों का दान करने में - सभी महारथियों से नम्बरबन कौन हैजनक। यह गुण उसमें विशेष है। तो एक दो से यह गुण उठाना चाहिए।
(आबू म्यूजियम की तैयारी के बारे में बापदादा ने पूछा)
दूरादेशी और विशाल बुद्धि बन म्युजियम तैयार करना है। पहले ही भविष्य को सोच समय को सफल करने का गुण धारण करना है और टाइम पर तैयार भी करना है। जल्दी भी हो और सम्पूर्ण भी हो तो कमाल है। अगर कोई भी कमी रही तो उस कमी की तरफ सभी की नजर जायेगी। ऐसी कमी न हो। सभी के मुख से कमाल हैऐसा निकलना चाहिए। सारा दैवी परिवार आपका चेहरा म्युजियम के दर्पण में देखेंगे।
अच्छा !!!

Hindi Avyakt Vani 04/03/1969

04-03-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

होली के शुभ अवसर
आज आपकी खास होली है क्याहोली कैसे मनाई जाती हैहोली मनाने आती हैकाम की होली कौन सी हैवर्तमान पार्ट अनुसार होली कैसे मनायेंगेवर्तमान समय कौन सी होली मनाने की आवश्यकता हैहोली में कई बातें करनी होती है। लग भी जाता है। जलाया भी जाता है और साथ-साथ श्रृंगारा भी जाता है। और कुछ मिटाना भी होता है। जो भी बातें होली में करनी है वह सभी इस समय चल रही है। जलाना क्या हैमिटाना क्या हैरंगना क्या है और श्रृंगारना क्या हैयह सभी कर लेना इसको कहा जाता है मनाना। अगर इन चारों बातों में से कुछ कमी है तो मनाना नहीं कहेंगे। होली के दिनों में बहुत सुन्दर सजते हैं। कैसे सजते हैंदेव- ताओं के समान। आप सभी सजे हुए हैंसजावट में कोई कमी तो नहीं है। सजावट में मुख्य होली का श्रृंगार कौनसा होता हैसांग जो बनाते हैं उन्हों को पहले-पहले मस्तक में बल्ब लगाते हैं। यह भी इस समय की कॉपी की हुई है। आप का भी काम का मुख्य श्रृंगार है मस्तक पर आत्मा का दीपक जलाना। इसकी निशानी बल्व जलाते हैं। लेकिन यह सभी बातें होने लिए होली का अर्थ याद रखना है। ' 'होली '' जो कुछ हुआ वह हो गया। हो लिया। जो सीन हुई होली अर्थात् बीत चुकी। वर्तमान समय जो प्याइन्ट ध्यान में रखनी है वह है यह होली की अर्थात् ड्रामा के ढाल की। जब ऐसे मजबूत होंगे तब वह रंग भी पक्का लग सकेगा। अगर होली का अर्थ जीवन में नहीं लायेंगे तो रंग कच्चा हो जाता है। पक्का रंग खाने के लिए हर वक्त सोचो हो ली। जो बीता हो ही गया। ऐसी होली मना रहे होवा कभी-कभी ड्रामा की सीन देखकर कुछ मंथन चलता है। ज्ञान का मंथन दूसरी बात है। लेकिन ड्रामा की सीन पर मंथन करना क्योंक्याकैसे। वह किस चीज का मंथन किया जाता। दही को जब मंथन किया जाता है तब मक्खन निकलता है। अगर पानी को मंथन करेंगे तो क्या निकलेगाकुछ भी नहीं। रिजल्ट में यही होगा एक तो थकावटदूसरा टाइम वेस्ट। इसलिए यह हुआ पानी का मंथन। ऐसा मंथन करने के बजाये ज्ञान का मंथन करना है। साकार रूप में लास्ट दिनों में सर्विस की मुख्य युक्ति कौन सी सुनाई थी? ' 'घेराव डालना' ' डबल घेराव डालना है एक तो वाणी द्वारा सर्विस का दूसरा- अव्यक्त आकर्षण का। यह ऐसा घराव डालना है जो खुद न उससे निकल सकेंन दूसरे निकल सकें। घेराव डालने का ढंग अभी तक प्रैक्टिकल में दिखाया नहीं है। म्युजियम बनाना तो सहज है। म्युजियम बनाना यह कोई घेराव डालना नहीं है। लेकिन अपने अव्यक्त आकर्षण से उन्हों को घायल करना यह है घेराव डालना। वह अभी चल रहा है। अभी सर्विस का समय भी ज्यादा नहीं मिलेगा। समस्यायें ऐसी खड़ी हो जाएँगी जो आपके सर्विस में भी बाधा पड़ने की सम्भावना होगी। इसलिए जो समय मिल रहा है उसमें जिसको जितनी सर्विस करनी है वह अधिक से अधिक कर लें। नहीं तो सर्विस का समय भी होली हो जायेगा। यानी बीत जायेगा। इसलिए अब अपने को आपे ही ज्यादा में ज्यादा सर्विस के बन्धन में बांधना चाहिए। इस एक बन्धन से ही अनेक बन्धन मिट जाते हैं। अपने को खुद ईश्वरीय सेवा में लगाना चाहिए औरों के कहने से नहीं। औरों के कहने से क्या होगाआधा फल मिलेगा। क्योंकि जिसने कहा अथवा प्रेरणा दी उनकी भाईवारी हो जाती है। दुकान में अगर दो भाईवार (साझीदार) हो तो बंटवारा हो जाता है ना! एक है तो वह मालिक हो रहता है। इसलिए अगर किसके कहने से करते हैं तो उस कार्य में भाईवारी हो जाती है। और स्वयं ही मालिक बन करके करते हैं तो सारी मिलकियत के अधिकारी बन जाते हैं। इसलिए हरेक को मालिक बनकर करना है लेकिन मालिकपने के साथ-साथ बालकपन भी पूरा होना चाहिए। कहाँ-कहाँ मालिक बनकर खड़े हो जाते हैंकहाँ फिर बालक होकर छोड़ देते हैं। तो न छोड़ना है न पकड़ना है। पकड़ना अर्थात् जिद से नहीं पकड़ना है। कोई चीज को अगर बहुत जोर से पकड़ा जाता है तो उस चीज का रूप बदल जाता है ना। फूल को जोर से पकड़ों तो क्या हाल होगा। पकड़ना तो है लेकिन कहाँ तककैसे पकड़ना हैयह भी समझना है। या तो पकड़ते अटक जाते हैं वा छोड़ते हैं तो छूट जाते हैं। दोनों ही समान रहे यह पुरुषार्थ करना है। जो मालिक और बालक दोनों रीति से चलने वाला होगा उनकी मुख्य परख यह होगी - एक तो निर्माणता होगी उसके साथ निरहंकारीनिर्माण और साथ-साथ प्रेम स्वरूप। यह चारों ही बातें उनके हर चलन से देखने में आएँगी। अगर चारों में से कोई भी कम है तो कुछ स्टेज की कमी है। अच्छा-
वतन में आज होली कैसे खेली मालूम हैसिर्फ बच्चों के साथ ही थे। आप भी होली मना रहे हो ना! वहाँ सन्देशी आई तो एक खेल किया। कौन सा खेल किया होगा? (आप ले चलो तो देखे) बुद्धि का विमान तो है। बुद्धि का विमान तो दिव्य दृष्टि से भी अच्छा है। यहाँ तो वह हो ही नहीं सकता। वह चीज ही नहीं। आज सुहेजों का दिन था ना! तो जब सन्देशियॉ वतन में आई तो साकार को छिपा दिया। एक बहुत सुन्दर फूलों की पहाड़ी बनाई थी उनके अन्दर साकार को छिपाया हुआ था। दूर से देखने में तो पहाड़ी ही नजर आती थी। तो जब सदेशी आई तो साकार को देखा नहीं। बहुत ढूढा देखने में ही नहीं आया। फिर अचानक ही जैसे छिपने का खेल करते हैं ना! ऐसा खेल देखा। फूलों के बीच साकार बैठा हुआ नजर आया। वह सीन बड़ी अच्छी थी। 
अव्यक्त बापदादा हरेक को अमृत कर भोग दे रहे थे और एकएक से मुलाकात भी कर रहे थे। खास म्युजियम वालों को डायरेक्शन दे रहे थे अव्यक्ति आकर्षण से म्युजियम ऐसा बनाओ जो कोई भी अन्दर आयेदेखे तो एकदम आकर्षित हो जाये।
अच्छा !!!

Hindi Avyakt Vani 15/02/1969

15-02-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

"शिवरात्रि के अवसर पर अव्यक्त बापदादा के महावाक्य"
(सन्तरी दादी के तन द्वारा)
आज किसके स्वागत का दिन है? (बाप और बच्चों का) परन्तु कई बच्चे अपने को भी भूले हुए हैं तो बाप को भी भुला दिया है। आज कि दिन वह स्वागत है जैसे पहले होती थीकितनी तारें आती थी! तो भूला ना। बाप जब है ही तो फिर भुलाना कहाँ तक! यह है निश्चययह है पढ़ाई। जब पढ़ाई कायम है तो वह कार्य भी जैसा का वैसा चलता रहेगा। वह निश्चय नहीं तो कार्य में भी जरा बच्चे अपने मर्तबे को समझते हैं कि मैं किसका बच्चा हूँबाप सदा है तो बच्चे भी सदा है। परन्तु देह अभिमान अपने स्वधर्म को भुला देता है। भूलने से कार्य कैसे चलेगा। आगे कैसे बढ़ेंगेजबकि बाप ने अपना परिचय दिया हैबच्चों को भी अपना परिचय मिला हुआ है। कितना समय से इसी लक्ष्य को पक्का कराने के लिए मेहनत की गई हैउस मेहनत का फल कहाँ तकसिर्फ याद कराने के लिए यह कह रहा हूँमुरली तो चलानी नहीं है। सिर्फ बच्चों से मिलने आया हूँ। बच्ची ने कहा बहुत याद कर रहे हैंबाबा आप चलेंगे तो रिफ्रेश करेंगे। रिफ्रेश तो हो ही - अगर निश्चय है तो। फिर भी बच्चों से मिलने के लिए आना पड़ाथोड़े समय के लिए। स्वमान की स्मृति दिलाने के लिए आये हैं। बच्चेसदैव अपने को सौभाग्यशाली समझें। सदा सौभाग्यशाली उनको कहा जाता है जिनका बापटीचर और सतगुरू से पूरा कनेक्शनपूरी लगन है।
कन्या की सगाई के बाद क्या होता हैपति के साथ लगन लग जाती है। तब उनको कहते हैं सदा सुहागिन। परन्तु वह कहाँ तक सुहागिन हैअन्दर में क्या भरा पड़ा है! कन्या सौ ब्राह्माणों से उत्तम गिनी जाती है। सगाई करने के बाद अशुद्ध बनने कारण आन्तरिक अभागिन है। यह किसको भी पता नहीं है। बाप ही बतलाते हैं सदा सुहागिन कौन है। सदा के लिए परमात्मा से पूरी लगन रहेवो सदा सुहागिन है।
यह तो अभी पढ़ाई का समय हैबाप अपना कर्तव्य कर रहे हैंडायरेक्शन देते पढ़ाते हैं। जब तक पढ़ाना हैपढ़ाते रहेंगे। विनाश सामने खड़ा हैउसका कनेक्शन बाप के साथ है। ऐसे मत समझो बाप की जुदाई है। जुदाई भी नहीं विदाई भी नहीं। जब तक विनाश नहीं तब तक बाप साथ है। वतन में बाप गया है कोई कार्य के लिए। समय अनुसार वह सब कुछ होता रहेगा। इसमें न कोई विदाई हैन जुदाईजुदाई लगती हैतुमने विदाई दी थीअगर विदाई दी होगी तो जुदाई भी होगी। विदाई नहीं दी होगी तो जुदाई भी नहीं होगी। यह ड्रामा के अन्दर पार्ट चलता रहता है। बाप का खेल चल रहा है। खेल में खेल चलता रहेगा। आगे तो बहुत ही खेल देखने हैं। इतनी हिम्मत हैजब हिम्मत रखेंगे तब बहुत देखेंगे। आगे बहुत कुछ देखना है। परन्तु कदम को सम्भाल-सम्भाल कर चलाना है। अगर सम्भल कर नहीं चलेंगे तो कहाँ खड्डा भी आ जायेगा। एक्सीडेंट भी हो पड़ेंगे। बच्चों से मिलने के लिए थोड़े समय के लिए आया हूँ। बहुत कार्य करना है। वतन से बहुत कुछ करना पड़ता है। बच्चों की भी दिल पूरी करनी पड़ती है तो भक्तों की भी दिल पूरी करनी पड़ती है। सभी कार्य काम पर ही होते हैं। बाप का परिचय मिला ,खज़ानालाटरी मिली। अभी बच्चों की सर्विस पूरी की। वतन से अभी सबकी करनी है। बच्चे सगे भी हैं तो लगे भी हैं। सर्विस तो सबकी करनी है। सवेरे भी आकर दृष्टि से परिचय दे दिया। दृष्टि द्वारा सर्चलाइट दे सभी को सुख देना बाप का कर्तव्य है। अभी तो सभी को म्यूजियम की सर्विस करनी है। सबको बाप का परिचय देना है। बाप ने जो सर्विस के चित्र बनवाये हैंउस पर सर्विस करनी है। अंगुली देने से पहाड़ उठता है ना। यही गायन है गोप गोपियों ने अंगुली से पहाड़ उठाया। अंगुली नहीं देंगे तो पहाड़ नहीं उठेगा। सृष्टि पर आत्माओं का उद्धार करवह पहाड़ उठाकर फिर साथ ले जाना है। समूह होता है ना। अन्त में समूह बनकर सभी के साथ रहना है। पहले-पहले साक्षात्कार में लाल-लाल समूह देखा था तब तो समझ में नहीं आया परन्तु अब वही आत्माओं का समूह हैजिनको साथ ले जाने का ड्रामा के अन्दर प्रोग्राम है। सभी की सर्विस करनी है। अच्छा
सवेरे उठकर बाप की याद में रहोक्योंकि उस समय बाप सभी को याद करते हैं। उस समय कोई-कोई बच्चे दिखाई नहीं पड़ते हैं। ढूढना पड़ता है। भल अकेले रीति याद करते हैंपरन्तु संगठन के साथ भी जरूर चलना है। जितना याद में रहेंगे उतना ही बाप के नजदीक होते जायेंगे। बाप को भुलाने से मूंझते है। बाप को सदैव साथ रखेंगे तो भूल नहीं सकते।

Hindi Avyakt Vani 06/02/1969

06-02-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"महिमा सुनना छोड़ो – महान बनों"
सभी याद की यात्रा में बैठे होपढ़ाई का सार तो समझ में आ गया। उस सार को जीवन में लाकर के दुनिया को वह राज सुनाना है। रचयिता और रचना की नालेज को तो समझ गये हो। सुना तो बहुत है लेकिन अब जो सुना है वह स्वरूप बनके सभी को दिखाना है। कैसे दिखायेंगेआपकी हर चलन से बाप और दादा के चरित्र नजर आवे। आपकी आँखों में उस ही बाप को देखें। आपकी वाणी से उन्हीं की नालेज को सुनें। हर चलन मेंहर चरित्र समाया हुआ होना चाहिए। सिर्फ बाप के चरित्र नहीं लेकिन बाप के चरित्र देख बच्चे भी चरित्रवान बन जायें। आपके चित्र में उसी अलौकिक चित्र को देखें। आप के व्यक्त रूप में अव्यक्त मूर्त नजर आवे। ऐसा पुरूषार्थ करकेजो बापदादा ने मेहनत की है उसका फल स्वरूप दिखाना है। जैसे अज्ञान काल में भी कोई-कोई बच्चों में जैसे कि बाप ही नजर आता है। उनके बोल-चाल से अनुभव होता है जैसे कि बाप है। इसी रीति से जो अनन्य बच्चे हैं उन एक एक बच्चे द्वारा बाप के गुण प्रत्यक्ष होने चाहिए और होंगे। कैसे होंगेउसका मुख्य प्रयत्न क्या हैमुख्य बात यही है जो साकार रूप से भी सुनाया है कि याद की यात्राअव्यक्त स्थिति में स्थित होकर हर कर्म करना है। अब तो बच्चों को बहुत सामना करना है। लेकिन समर्थ साथ है इसलिए कोई मुश्किल नहीं है। सिर्फ एक बात सभी को ध्यान में रखनी है कि सामना करने के लिए बीच में रूकावट भी आयेगी। सामना करने में रूकावट कौन सी आयेगीमालूम है? (देह अभिमान) देह अभिमान तो एक मूल बात है लेकिन सामना करने के लिए बीच में कामना विघ्न डालेगी। कौन सी कामनामेरा नाम होमैं ऐसा हूँमेरे से राय क्यों नहीं लीमेरा मूल्य क्यों नहीं रखायह अनेक प्रकार की कामनायें सामना करने में विघ्न रूप में आयेगी। यह याद रखना है हमको कोई कामना नहीं करनी है। सामना करना है। अगर कोई कामना की तो सामना नहीं कर सकेंगेऔर अव्यक्त स्थिति में महान बनने के लिए एक बात जो कहते रहते हैं - वह धारण कर ली तो बहुत जल्दी और सहज अव्यक्त स्थिति में स्थित हो जायेंगे। वह कौन-सी बातहम अभी मेहमान है। क्योंकि आप सभी को भी वाया सूक्ष्मवतन होकर घर चलना है। हम मेहमान हैं ऐसा समझने से महान् स्थिति में स्थित हो जायेंगे। मेहमान के बजाए जरा भी एक शब्द में अन्तर कर लिया तो गिरावट भी आ जायेगी। वह कौन सा शब्दमेहमान समझना है लेकिन महिमा में नहीं आना है। अगर महिमा में आ गये तो मेहमान नहीं बनेंगे। मेहमान समझेंगे तो महान् बनेंगे। है जरा सा अन्तर। मेहमान और महिमा। लेकिन जरा सा अन्तर भी अवस्था को बहुत नीचे ऊपर कर देता है।
तुम सभी को ज्ञान कौनसा देते होत्रिमूर्ति का। जैसे त्रिमूर्ति का ज्ञान औरों को देते हो वैसे अपने पास भी तीन बातों का ज्ञान रखना है। तीन बातें छोड़ो और तीन बातें धारण करो। अब यह तीन बातें छोड़ेंगे तब ही स्वरूप में स्थित होंगे। सर्विस में सफलता भी होगी। बताओ कौन सी तीन बातें छोड़नी हैजो सर्विस में विघ्न डालती हैवह छोड़नी है। एक तो-कभी भी कोई बहाना नहीं देना। दूसरा कभी भी किससे सर्विस के लिए कहलाना नहीं। तीसरा - सर्विस करते कभी मुरझाना नहीं। बहानाकहलाना और मुरझाना यह तीन बातें छोड़नी है। और फिर कौनसी तीन बातें धारण करनी हैंत्यागतपस्वा और सेवा। यह तीन बातें धारणा में चाहिए। तपस्वा अर्थात् याद की यात्रा और सर्विस के बिना भी जीवन नहीं बन सकती। इन दोनों बातों की सफलता त्याग के बिना नहीं हो सकती। इसलिए तीन बातें छोड़नी है और तीन बातें धारण करनी है। अगर इन तीनों बातों की धारणा हुई तो क्या बन जायेंगेजो आपका गायन है ना वही स्वरूप बन जायेंगे। यहाँ आबू में भी आपका गायन है किस रूप में और कौन सा रूप यादगार का हैतपस्या के साथ-साथ और भी कोई मुख्य रूप का यादगार हैजिन्होंने देलवाड़ा मन्दिर ध्यान से देखा होगा उन्हें याद होगा। जैसे तपस्वी हैंतो त्रिनेत्री भी हैं। तपस्वा के साथ-साथ याद त्रिमूर्ति की है। तो जैसा यादगार है त्रिनेत्री काऐसा बनना है। तीसरा नेत्र कौन सा हैज्ञान का। ज्ञान का तीसरा नेत्र ही यादगार के रूप में दिखाया है। तपस्वी और त्रिनेत्री। तीसरा नेत्र कायम होगा तब ही तपस्वी बन सकेंगे। अगर ज्ञान का नेत्र गायब हो जाता है तो तपस्या भी नहीं रह सकती। इसलिए अब त्रिमूर्ति शब्द को भी याद करके धारणा में चलेंगे तो वह बन जायेंगे। जो शक्तियों का गायन हैजो प्रभाव है वह देखने में आयेगा। अभी गुप्त है। अभी तक शक्तियाँ गुप्त क्यों हैंक्योंकि अभी तक अपने स्वमानअपनी सर्विस और अपनी श्रेष्ठतायें अपने से ही गुप्त हैं। अपने से ही गुप्त होने कारण सृष्टि से भी गुप्त हैं। जब अपने में प्रत्यक्षता आयेगी तब सृष्टि में भी प्रत्यक्षता होगी।
अभी शिवरात्रि का जो पर्व आ रहा है उनको और भी धूमधाम से मनाना है। बड़े उमंग और हुल्लास से परिचय देना है। क्योंकि बाप के परिचय में बच्चों का परिचय भी आ जाता हे। बच्चे बाप का परिचय देंगे तो बाप फिर अव्यक्त में बच्चों का परिचयबच्चों का साक्षात्कार आत्माओं को कराते रहेंगे। तो इस शिवरात्रि पर कुछ नवीनता करके दिखाना है। क्या नवीनता करेंगेअब तक जो भाषण किये हैं वह यथा योग यथाशक्ति तो करते रहते हो लेकिन अब खास शक्ति रूप से भाषण करने हैं। शक्ति रूप का भाषण क्या होता हैललकार करना। क्या ललकार करेंगेऔर ही जोर-शोर से समय की पहचान दो। और उन्हों को बार-बार सुनाओ कि यह बाप का कर्तव्य अब जास्ती समय नहीं है। कुछ तो हाथ से गंवा दिया लेकिन जो कुछ थोड़ा समय रहा हैउनको भी गंवा न दो। ऐसे फोर्स से समय की पहचान दो। जैसे आजकल साइंस वाले ऐसे-ऐसे बाम्बस बना रहे हैं जो अपने स्थान पर बैठे हुए भी जहाँ बम लगाना होगा वहाँ का निशाना दूर बैठे भी कर सकते हैं। तो साइंस की शक्ति से तो श्रेष्ठ साइलेन्स है। जैसे वह साइंस के गोले बनाते हैं - वैसे अब शक्तियों को साइलेन्स की शक्ति से गोले फेंकने हैं। शुरू-शुरू में शक्तियों की ललकार ही चलती थी। अभी शुरू जैसे ललकार नहीं है। अभी विस्तार में पड़ गये हैं। विस्तार में पड़ने से ललकार का रूप गुप्त हो गया है। अभी फिर से बीजरूप अवस्था में स्थित होकर ललकार करो। उस ललकार से कईयों में बीज पड़ सकता है। लेकिन बीजरूप स्थिति में स्थिति रहेंगे तो अनेक आत्माओं में समय की पहचान और बाप की पहचान का बीज पड़ेगा। अगर बीजरूप स्थिति में स्थित न रहे सिर्फ विस्तार में चले गये तो क्या होगाज्यादा विस्तार से भी वैल्यु नहीं रहेगी। व्यर्थ हो जायेगा। इसलिए बीजरूप स्थिति में स्थित हो बीजरूप की याद में स्थित हो फिर बीज डालो। फिर देखना यह बीज का फल कितना अच्छा और सहज निकलता है। अभी तक मेहनत जास्ती की है प्रत्यक्षफल कम है। अभी मेहनत कम करो प्रत्यक्षफल ज्यादा दिखाओ। स्नेह तो सभी का है ही लेकिन स्नेह का स्वरूप भी कुछ दिखाना है। यूँ तो सदैव इस स्थिति में रहना चाहिए लेकिन खास शिवरात्रि तक हरेक बच्चे को ऐसा समझना चाहिए जैसे शुरू में आप बच्चों की भट्टी के प्रोग्राम चलते थेइसी रीति से हरेक को समझना चाहिए शिवरात्रि तक हमको याद की यात्रा की भट्टी में ही रहना है। बिल्कुल अव्यक्त स्थिति में स्थित रहने काअपनी चेकिंग करने का ध्यान रखो। फिर इस अव्यक्त स्थिति का कितना प्रभाव निकलता है। मुश्किल नहीं है। बहुत सहज है। कारोबार में आते हुए भी भट्टी चल सकती है। यह तो आन्तरिक स्थिति है। आन्तरिक स्थिति का प्रभाव जास्ती पड़ता है।
सभी अमृतवेले मुलाकात करते होअभी तक ऐसा वायुमण्डल नहीं पहुँचा है। अब तक मधुबन वालों ने भी स्नेह का सबूत नहीं दिया है। चारों ओर से बहुत कम बच्चे हैं जिन्होंने स्नेह का सबूत दिया है। बाप का बच्चों से कितना स्नेह था। स्नेह का सबूत प्रैक्टिकल में कितना समय दिया। क्या दिया थायाद हैखास अपनी तबियत को भी न देखकर क्या सबूत दिया थाअपनी शारीरिक स्थिति को न देखते भी कितना समय खास सर्च लाईट देते थे। कितना समय स्नेह का सबूत दिया। आप कहते थे शरीर पर इफेक्ट आता है लेकिन बाबा ने अपने शरीर को देखायह स्नेह का सबूत था। अब बच्चों को भी रिटर्न में स्नेह का सबूत देना है। जो कर्म करके दिखाया वही करना है। अमृतवेले जैसे साकार रूप में करके दिखाया वैसे ही बच्चों को करना चाहिए। नहीं तो अब तक यही रिजल्ट देखी हैइस बात में अपने दिल को खुश कर लेते हैं। उठे और बैठे। लेकिन वह रूहाबशक्ति स्वरूप की स्मृति नहीं रहती। शक्ति रूप के बदले क्या मिक्स हो गया हैसुस्ती। तो सुस्ती मिक्स होने से मुलाकात करते हैं लेकिन लाइन क्लीयर नहीं होती है इसलिए मुलाकात से जो अनुभव होना चाहिए वह नहीं कर पाते हैं। मिक्स-चर है। यहाँ शुरू करेंगे तो मधुबन-वासियों को देख सब करेंगे। मधुबन निवासी जो खास स्नेही हैं उनको खास सैक्रीफाइज (बलिदान) करना है। स्नेह में हमेशा सेक्रीफाइज किया जाता है।
अच्छा - ओम् शान्ति।

Hindi Avyakt Vani 02/02/1969

02-02-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन


"अव्यक्त मिलन के अनुभव की विधि"
प्रेम स्वरूप बच्चेज्ञान सहित प्रेम जो होता है वही यथार्थ प्रेम होता है। आप सभी का प्रेमरस बापदादा को भी खींच लाता है। सभी बच्चों के दिल के अन्दर एक आशा दिखाई दे रही है। वह कौन सीकई बच्चों ने सन्देश भेजा कि आप हमें भी अपने अव्यक्त वतन का अनुभव कराओ। यह सभी बच्चों की आशायें अब पूर्ण होने का समय पहुँच ही गया है। आप कहेंगे कि सभी सन्देशी बन जायेंगे। लेकिन नहीं। अव्यक्त वतन का अनुभव भी बच्चे करेंगे। लेकिन दिव्य- बुद्धि के आधार पर जो अब अलौकिक अनुभव कर सकते हो वह दिव्य दृष्टि द्वारा करने से भी बहुत लाभदायकअलौकिक और अनोखा है। इसलिए जो भी बच्चे चाहते हैं कि अव्यक्त बाप से मुलाकात करेंवह कर सकते हैं। कैसे कर सकते हैंइसका तरीका सिर्फ यही है कि अमृत- वेले याद में बैठो और यही संकल्प रखो कि अब हम अव्यक्त बापदादा से मुलाकात करें। जैसे साकार में मिलने का समय मालूम होता था तो नींद नहीं आती थी और समय से पहले ही बुद्धि द्वारा इसी अनुभव में रहते थे। वैसे अब भी अव्यक्त मिलन का अनुभव प्राप्त करना चाहते हो तो उसका बहुत सहज तरीका यह है। अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर रूह-रूहान करो। तो अनु- भव करेंगे कि सचमुच बाप के साथ बातचीत कर रहे हैं। और इसी रूह-रूहान में जैसे सन्दे- शियों को कई दृश्य दिखाते हैं वैसे ही बहुत गुह्यगोपनीय रहस्य बुद्धियोग से अनुभव करेंगे। लेकिन एक बात यह अनुभव करने के लिए आवश्यक है। वह कौनसीमालूम हैअमृतवेले भी अव्वक्त स्थिति में वही स्थित हो सकेंगे जो सारा दिन अव्यक्त स्थिति में और अन्तर्मुख स्थिति में स्थित होंगे। वही अमृतवेले यह अनुभव कर सकेंगे। इसलिए अगर स्नेह है और मिलने की आशा है तो यह तरीका बहुत सहज है। करने वाले कर सकते हैं और मुलाकात का अनोखा अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।
वतन में बैठे-बैठे कई बच्चों के दिलों की आवाज पहुँचती रहती है। आप सोचते होंगे - शिव- बाबा बहुत कठोर है लेकिन जो होता है उसमें रहस्य और कल्याण है। इसलिए जो आवाज पहुँ- चती है वह सुनकर के हर्षाता रहता हूँ। क्या बापदादा निर्मोही हैआप सभी बच्चे निर्मोही होनिर्मोही बने होतो बापदादा निर्मोही और बच्चों में शुद्ध मोह तो मिलन कैसे होगा। बापदादा में शुद्ध मोह है? (साकार बाबा का बच्चों में शुद्ध प्यार था) शिवबाबा का नहीं हैबापदादा का है? (जैसा हमारा है वैसा नहीं) शुद्ध मोह बच्चों से भी जास्ती है। लेकिन बापदादा और बच्चों में एक अन्तर है। वह शुद्ध मोह में आते हुए भी निर्मोही हैं और बच्चे शुद्ध मोह में आते हैं तो कुछ स्वरूप बन जाते हैं। या तो प्यारे बनते या तो न्यारे बनते। लेकिन बापदादा न्यारे और प्यारे साथ-साथ बनते हैं। यह अन्तर जो रहा हुआ है इसको जब मिटायेंगे तो क्या बनेंगेअन्तर्मुखअव्यक्तअलौकिक। अभी कुछ कुछ लौकिकपन भी मिल जाता है। लेकिन जब यह अन्तर खत्म कर देंगे तो बिल्कुल अलौकिक और अन्तर्मुखीअव्यक्त फरिश्ते नजर आयेंगे। इस साकार वतन में रहते हुए भी फरिश्ते बन सकते हो। आप फिर कहेंगे आप वतन में जाकर फरिश्ता क्यों बनेंयहाँ ही बनते। लेकिन नहीं। जो बच्चों का काम वह बच्चों को साजे। जो बाप का कार्य है वह बाप ही करते हैं। बच्चों को अब पढ़ाई का शो दिखाना है। टीचर को पढ़ाई का शो नहीं दिखना हैटीचर को पढ़ाई पढ़ानी होती है। स्टूडेन्ट को पढ़ाई का शो दिखाना होता है। शो केस में शक्तियों को पाण्डवों को आना है। बापदादा तो है ही गुप्त।
अभी सभी के दिल में यही संकल्प है कि अब जल्दी-जल्दी ड्रामा की सीन चलकर खत्म हो लेकिन जल्दी होगीहो सकती हैहोगी या हो सकती हैभावी जो बनी हुई हैवह तो बनी हुई बनी ही रहेगी। लेकिन बनी हुई भावी में यह इतना नजर आता है कि अगर कल्प पहले माफिक संकल्प आता है तो संकल्प के साथ-साथ अवश्य पहले भी पुरूषार्थ तीव्र किया होगा। तो यह भी संकल्प आता है कि ड्रामा का सीन जल्दी पूरा कर सभी अव्यक्तवतन वासी बन जायें। बनना तो है। लेकिन आप बच्चों में इतनी शक्ति है जो अव्यक्त वतन को भी व्यक्त में खींचकर ला सकते हो। अव्यक्त वतन का नक्शा व्यक्त वतन में बना सकते हो। आशायें तो हरेक की बहुत हैं। ऐसे ही पहुँचती हैं जैसे इस साकार दुनिया में बहुत बड़ी आफिस होती है टेलीफोन और टेलीग्राफ कीवैसे ही बहुत शुद्ध संकल्पों की तारे वतन में पहुँचती रहती हैं। अभी क्या करना हैकई बच्चों के कुछ लोक संग्रह प्रति प्रश्न भी हैं वह भी पहुँचते हैं। कई बच्चे मूंझते हैं कि साकार द्वारा तो यह कहा कि सूक्ष्मवतन है ही नहींतो बाबा कहाँ गयेकहाँ से मिलने आते हैंकहाँ यह सन्देश भेजते हैंक्यों भोग लगाते होइसका भी राज है। क्यों कहा गया थाइसका मूल कारण यही है कि जैसे आप लोगों ने देखा होगा कि कभी-कभी छोटे बच्चे जब कोई चीज के पीछे लग जाते हैं तो वह चीज भल अच्छी भी होती है लेकिन हद से ज्यादा उस अच्छी चीज के पीछे पड़ जाते हैं तो बच्चों से क्या किया जाता हैवह चीज उनकी आँखों से छिपाकर यह कहा जाता है कि है ही नहीं। इसलिए ही कहा जाता है कि इसकी जो एकस्ट्रा लगन लग गई हैवह कुछ ठीक हो जाए। इसी रीति से वर्तमान समय कई बच्चे इन्ही बातों में कुछ चटक गये थे। तो उनको छुड़ाने के लिए साकार में कहते थे कि यह सूक्ष्मवतन है ही नहीं। तो यह भी बच्चों की इस बात से बुद्धि हटाने के लिए कहा गया था। लेकिन इसका भाव यह नहीं है कि अगर बच्चों से चीज छिपाई जाती है तो वह चीज खत्म हो जाती है। नहीं। यह एक युक्ति हैचटकी हुई चीज से छुड़ाने की। तो यह भी युक्ति की। अगर सूक्ष्मवतन नहीं तो भोग कहाँ लगाते होइस रसम रिवाज को कायम क्यों रखाकोई भी ऐसा कार्य होता है तो खुद भी सन्देश क्यों पुछवाते थेतो ऐसे भी नहीं कि सूक्ष्मवतन नहीं है। सूक्ष्मवतन है। लेकिन अब सूक्ष्मवतन में आने जाने के बजाए स्वयं ही सूक्ष्मवतन वासी बनना है। यही बापदादा की बच्चों में आशा है। आना-जाना ज्यादा नहीं होना चाहिए। यह यथार्थ है। कमाई किसमें हैतो बाप बच्चों की कमाई को देखते हैं और कमाई के लायक बनाते हैं। इसलिए यह सभी रहस्य बोलते रहे। अभी समझा कि क्यों कहा था और अब क्या हैसूक्ष्मवतन के अव्यक्त अनुभव को अनुभव करो। सूक्ष्म स्थिति को अनुभव करो। आने जाने की आशा अल्पकाल की है। अल्पकाल के बजाए सदा अपने को सूक्ष्मवतनवासी क्यों नहीं बनातेऔर सूक्ष्मवतनवासी बनने से ही बहुत वण्डरफुल अनुभव करेंगे। खुद आप लोग वर्णन करेंगे कि यह अनुभव और सन्देशियों के अनु- भव में कितना फर्क हैवह कमाई नहीं। यह कमाई भी है और अनुभव भी। तो एक ही समय दो प्राप्ति हो वह अच्छा या एक ही चाहते होऔर कई बच्चों के मन में यह भी प्रश्न है कि ना मालूम जो बापदादा कहते थे कि सभी को साथ में ले जायेंगेअब वह तो चले गये। लेकिन वह चले गये हैंमुक्तिधाम में जा नहीं सकते - सिवाए बारात वा बच्चों के। बारात के बिगर अकेले जा सकते हैंबारात तैयार हैयही सुना है अब तक कि बारात के साथ ही जायेंगे। जब बारात ही सज रही है तो अकेले कैसे जायेंगे। अभी तो सूक्ष्मवतन में ही अव्यक्त रूप से स्थापना का कार्य चलता रहेगा। जब तक स्थापना का कार्य समाप्त नहीं हुआ है तब तक बिना कार्य सफल किये हुए घर नहीं लौटेंगेसाथ ही चलेंगे और फिर चलने के बाद क्या करेंगेमालूम है - क्या करेंगेसाथ चलेंगे और साथ रहेंगे। और फिर साथ-साथ ही सृष्टि पर आयेंगे। आप बच्चों का जो गीत है कभी भी हाथ और साथ न छूटेतो बच्चों का भी वायदा है तो बाप का भी वायदा है। बाप अपने वायदे से बदल नहीं सकते। और भी कोई प्रश्न हैयूँ तो समय प्रति समय सब स्पष्ट होता ही जायेगा। कईयों के मन में यह भी है ना कि ना मालूम जन्म होगा वा क्या होगाजन्म होगाजैसे आप की मम्मा का जन्म हुआ वैसे होगाआप बच्चों का विवेक क्या कहता हैड्रामा की भावी को देख सकते होथोड़ा-थोड़ा देख सकते होजब आप लोग सबको कहते हो कि हम त्रिकालदर्शी बाप के बच्चे हैं तो आने वाले काल को नहीं जानते होआपके मन के विवेक अनुसार क्या होना चाहिएअव्यक्त स्थिति में स्थित होकर हाँ वा नाँ कहोतो जवाब निकल आयेगा। (इस रीति से बापदादा ने दो चार से पूछा) बहुत करके सभी का यही विचार था कि नहीं होगा। आज ही उत्तर चाहते हो या बाद में! हलचल तो नहीं चम रही है। यह भी एक खेल रचा जाता है। छोटे-छोटे बच्चे तालाब में पत्थर मारकर उनकी लहरों से खेलते हैं। तो यह भी एक खेल है। बाप तुम सभी के विचार सागर में प्रश्रों के पत्थर फेंक कर तुम्हारे बुद्धि रूपी सागर में लहर उत्पन्न कर रहे हैं। उन्ही लहरों का खेल बापदादा देख रहे हैं। अभी आप सबके साथ ही अव्यक्त रूप से स्थापना के कार्य में लगे रहेंगे। जब तक स्थापना का पार्ट है तब तक अव्यक्त रूप से आप सभी के साथ ही हैं। समझ गयेवतन में मम्मा को भी इमर्ज किया था। पता है क्या बात चलीजैसे साकार रूप में साकर वतन में मम्मा बोलती थी कि बाबा आप बैठे रहिये हम सभी काम कर लेंगे। इसी ही रीति से वतन में भी यही कहा कि हम सभी कार्य स्थापना के जो करने हैं वह करेंगे। आप बच्चों के साथ ही बच्चों को बहलाते रहिये। ऐसे ही साकार में कहती थी। वही वतन में रूह-रूहान चली। आप सभी के मन में तो होगा ही-कि हमारी मम्मा कहाँ गई। अभी यह राज इस समय स्पष्ट करने का नहीं है। कुछ समय के बाद सुनायेंगे कि वह कहाँ और क्या कर रही है। स्थापना के कार्य में भी मददगार है लेकिन भिन्न नाम रूप से। अच्छा - अब तो टाइम हो गया है।
आज वतन में दूर से ही सवेरे से खुशबू आ रही थी। देख रहे थे कैसे स्नेह से चीजे बना रहे हैं। आपने देखाभण्डारे में चक्र लगायाचीजों की खुशबू नहीं स्नेह की खुशबू आ रही थी। यह स्नेह ही अविनाशी बनता है। अविनाशी स्नेह है नायाद हरेक की पहुँचती हैउसका रेसपोंड लेने के लिए अवस्था चाहिए। रेसपान्ड फौरन मिलता है। जैसे साकार में बच्चे बाबा कहते थे तो बच्चों को रेसपांड मिलता था। तो रेसपान्ड अब भी फौरन मिलता है लेकिन बीच में व्यक्त भाव को छोड़ना पड़ेगा तब ही उस रेसपान्ड को सुन सकेंगे। अब तो और ही ज्यादा चारों ओर सर्विस करने का अनुभव कर रहे हैं। अब अव्यक्त होने के कारण एक और क्वालिटी बढ़ गई है। कौन सीमालूम हैवह यह है - पहले तो बाहरयामी थाअभी अन्तर्यामी हो गया हूँ। अव्यक्त स्थिति में जानने की आवश्यकता नहीं रहती। स्वत: ही एक सेकेण्ड में सभी का नक्शा देखने में आ रहा है। इसलिए कहते हैं कि पहले से एक और गुण बढ़ गया है। अव्यक्त स्थिति में तो खुशबू से ही पेट भर जाता है। आप लोगों को मालूम है?
एक मुख्य शिक्षा बच्चों के प्रति दे रहे हैं। अब सर्विस तो करनी ही हैयह तो सभी बच्चों की बुद्धि में लक्ष्य है और लक्ष्य को पूर्ण भी करेंगे लेकिन इस लक्ष्य को पूर्ण करने के लिए बीच में एक मुख्य विघ्न आयेगा। वह कौन सापता हैमुख्य विघ्न सर्विस में बाधा डालने के लिए कौन सा आयेगासभी के आगे नहीं मैजारटी के आगे आयेगा! वह कौन सा विघ्न हैपहले से ही बता देते हैं। सर्विस करते-करते यह ध्यान रखना कि मैंने यह कियामैं ही यह कर सकता हूँ यह मैं पन आना इसको ही कहा जाता है ज्ञान का अभिमानबुद्धि का अभिमानसर्विस का अभिमान। इन रूपों में आगे चलकर विघ्न आयेंगे। लेकिन पहले से ही इस मुख्य विघ्न को आने नहीं देना। इसके लिए सदा एक शब्द याद रखना कि मैं निमित्त हूँ। निमित्त बनने से ही निरा- कारीनिरहंकारी और नम्रचितनिःसंकल्प अवस्था में रह सकते हैं।
अगर मैंने कियामैं-मैं आया तो मालूम है क्या होगाजैसे निमित्त बनने से निराकारीनिरहंकारीनिरसंकल्प स्थिति होती है वैसे ही मैं मैं आने से मगरूरीमुरझाइसमायूसी आ जायेगी। उसकी फिर रिजल्ट क्या होगीआखरीन अन्त में उसकी रिजल्ट यही होती है कि चलते-चलते जीते हुए भी मर जाते हैं। इसलिए इस मुख्य शिक्षा को हमेशा साथ रखना कि मैं निमित्त हूँ। निमित्त बनने से कोई भी अहंकार उत्पन्न नहीं होगा। नहीं तो अगर मैं पन आ गया तो मतभेद के चक्र में आ जायेंगे। इसलिए इन अनेक व्यर्थ के चक्करों से बचने के लिए स्वदर्शनचक्र को याद रखना। क्योंकि जैसे-जैसे महारथी बनेंगे वैसे ही माया भी महारथी रूप में आयेगी। साकार रूप में अन्त तक कर्म करके दिखाया। क्या कर्म करके दिखायायाद हैक्या शिक्षा दी यही कि निरहंकारी और निर्माणचित होकर एक दो में प्रेम प्यार से चलना है। एक माताओं का संगठन बनाना। जैसे कुमारियों का ट्रेनिंग क्लास किया है वैसे ही मातायें जो मददगार बन सकती हैं और हैंउन्हों का मधुबन में संगठन रखना। कुमारियों के साथ माताओं का संगठन हो। संगठन के समय फिर आना होगा। स्नेह को देखते हैं तो ड्रामा याद आ जाता है। ड्रामा जब बीच में आता है तो साइलेन्स हो जाते हैं। स्नेह में आये तो क्या हाल हो जायेगा। नदी बन जायेंगे। लेकिन नहींड्रामा। जो कर्म हम करेंगे वह फिर सभी करेंगेइसलिए साइलेन्स। अगर सभी साथ होते तो जो अन्तिम कर्मातीत अवस्था का अनुभव था वह ड्रामा प्रमाण और होता। लेकिन था ही ऐसे इसलिए थोड़े ही सामने थे। सामने होते भी जैसे सामने नहीं थे। स्नेह तो वतन में भी है और रहेगा। अविनाशी है ना। लेकिन जो सुनाया कि स्नेह को ड्रामा साइलेन्स में ले आता है। और यही साइलेन्सशक्ति को लायेगी। फिर वहाँ साकार में मिलन होगा। अभी अव्यक्त रूप में मिलते हैं। फिर साकार रूप में सतयुग में मिलेंगे। वह सीन तो याद आती है ना। खेलेंगेपाठ- शाला में आयेंगेमिलेंगे। आप नूरे रत्न सतयुग की सीनरी वतन में देखते रहते हो। जो बाप देखते हैं वह बच्चे भी देखते रहते हैं और देखते जायेंगे।
अब तो ज्वाला रूप होना है। आपका ही ज्वाला रूप का यादगार है। पता है ज्वाला देवी भी है वह कौन हैयह सभी शक्तियों को ज्वालारूप देवी बनना है। ऐसी ज्वाला प्रज्जवलित करनी है। जिस ज्वाला में यह कलियुगी संसार जलकर भस्म हो जायेगा। अच्छा -
विदाई के समय :-
सभी सेन्टर्स के अव्यक्त स्थिति में स्थत हुए नूरे रत्नों को बाप व दादा का अव्यक्त यादप्यार स्वीकार हो। साथ-साथ जो ईशारा दिया है उसको जल्दी से जल्दी जीवन में लाने का तीव्र पुरूषार्थ करना है। अच्छा गुडनाईट। सभी शिव शक्तियों और पाण्डवों प्रति बाप का नमस्ते।

Hindi Avyakt Vani 25/01/1969

25-01-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

"समर्पण की ऊँची स्टेज – श्वांसों श्वांस स्मृति"
अव्यक्त स्थिति में स्थित होकर अव्यक्त को व्यक्त में देखो। आज एक प्रश्न पूछ रहे हैं। सर्व समर्पण बने हो? (सर्व समर्पण हैं ही) यह सभी का विचार है या और कोई का कोई और विचार हैसर्व समर्पण किसको कहा जाता हैसर्व में यह देह का भान भी आता है। देह ले लेंगे तो देनी भी पड़ेगी। लेकिन देह का भान तोड़कर समर्पण बनना है। आप क्या समझते होदेह के अभिमान से भी सम्पूर्ण समर्पण बने होमर गये हो वा मरते रहते होदेह के सम्बन्ध और मन के संकल्पों से भी तुम देही हो। यह देह का अभिमान बिल्कुल ही टूट जाए तब कहा जाए सर्व समर्पणमय जीवन। जो सर्व त्यागीसर्व समर्पण जीवन वाला होगा उनकी ही सम्पूर्ण अवस्था गाई जायेगी। और जब सम्पूर्ण बन जायेंगे तो साथ जायेंगे। आपने शुरू में संकल्प किया था ना कि बाबा जायेंगे तो हम भी साथ जायेंगे। फिर ऐसा क्यों नहीं कियायह भी एक स्नेह है। और संग तोड़ एक संग जोड़ने की यह चैन है जो अन्त समय की निशानी है। जब कहा था तो क्यों नहीं शरीर छोड़ाछोड़ सकते होअभी छूट भी नहीं सकता। क्योंकि जब तक हिसाब-किताब हैअपने शरीर से तब तक छूट नहीं सकता। योग से या भोग से हिसाब-किताब चुक्तू जरूर करना पड़ता है। कोई भी कड़ा हिसाब-किताब रहा हुआ है तो यह शरीर रहेगा। छूट नहीं सकता। वैसे तो समर्पण हो ही लेकिन अब समर्पण की स्टेज ऊँची हो गई है। समर्पण उसको कहा जाता है जो श्वांसों श्वांस स्मृति में रहे। एक भी श्वांस विस्मृति का न हो। हर श्वांस में स्मृति रहे और ऐसे जो होंगे उनकी निशानी क्या हैउनके चेहरे पर क्या नजर आयेगाक्या उनके मुख पर होगामालूम है?(हर्षितमुख) हर्षितमुखता के सिवाए और भी कुछ होगाजो जितना सहनशील होगा उनमें उतनी शक्ति बढ़ेगी। जो श्वांसों श्वांस स्मृति में रहता होगा उसमें सहनशी- लता का गुण जरूर होगा और सहनशील होने के कारण एक तो हर्षित और शक्ति दिखाई देगी। उनके चेहरे पर निर्बलता नहीं। यह जो कभी-कभी मुख से निकलता हैकैसे करेंक्या होगायह जो शब्द निर्बलता के हैंवह नहीं निकलने चाहिए। जब मन में आता है तो मुख पर आता है। परन्तु मन में नहीं आना चाहिए। मनमनाभव मध्याजी भव। मनमनाभव का अर्थ बहुत गुह्य है। मनबिल्कुल जैसे ड्रामा का सेकेण्ड बाई सेकेण्ड जिस रीति सेजैसा चलता हैउसी के साथ-साथ मन की स्थिति ऐसे ही ड्रामा की पटरी पर सीधी चलती रहे। जरा भी हिले नहीं। चाहे संकल्प सेचाहे वाणी से। ऐसी अवस्था होड्रामा की पटरी पर चल रहे हो। परन्तु कभी- कभी रुक जाते हो। मुख कभी हिल जाता है। मन की स्थिति हिलती है - फिर आप पकड़ते हो। यह भी जैसे एक दाग हो जाता है। अच्छा- फिर भी एक बात अब तक भी कुछ वाणी तक आई हैप्रैक्टिकल में नहीं आई है। कौन सी बात वाणी तक आई है प्रैक्टिकल नहींयही ड्रामा की ढाल जो सुनाई। लेकिन और बात भी बता रहे थे। वह यह है जैसे अब समय नजदीक हैवैसे समय के अनुसार जो अन्तर्मुखता की अवस्थावाणी से परेअन्तर्मुख होकरकर्मणा में अव्यक्त स्थिति में रहकर धारण करने की अवस्था दिखाई देनी चाहिएवह कुछ अभी भी कम है। कारोबार भी चले और यह स्थिति भी रहे। यह दोनों ही इक्ट्ठा एक समान रहे। अभी इसमें कमी है। अब साकार तो अव्यक्त स्थिति स्वरूप में स्थित है। लेकिन आप बच्चे भी अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे तो अव्यक्त मुलाकात का अलौकिक अनुभव कर सकते हो। एक मुख्य बात और भी हैवर्तमान समय ध्यान पर देते हैंजो तुम्हारे में होनी चाहिए। वह कौन सीकोई को आता हैजो मुख्य साकार रूप में भी कहते थे - अमृतवेले उठना। अमृतवेले का वायुमण्डल ऐसा ही रहेगा। साकार में अमृतवेले बच्चों से दूर होते भी मुलाकात करते थे। लेकिन अभी जब अमृतवेले चक्र लगाने बाबा आते हैं तो वह वायुमण्डल देखा नहीं है। क्यों थक गयेइस अमृ- तवेले के अलौकिक अनुभव में थकावट दूर हो जाती है। परन्तु यह कमी देखने में आती है। यह बापदादा की शुभ इच्छा है कि जल्दी से जल्दी इस अव्यक्त स्थिति का हर एक बच्चा अनुभव करे। वैसे तो आप जब साकार से साकार रीति से मिलते थे तो आप की आकारी स्थिति बन जाती थी। अब जितना-जितना अव्यक्त आकारी स्थिति में स्थित होंगे उतना ही अलौकिक अनुभव करेंगे।

Hindi Avyakt Vani 23/01/1969

23-01-69 ओम शान्ति अव्यक्त बापदादा मधुबन

"अस्थियाँ हैं – स्थिति की स्मृति दिलाने वाली"
आज मैं आप सभी बच्चों से अव्यक्त रूप में मिलने आया हूँ। जो मेरे बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित होंगे वही इसको समझ सकेंगे। आप सभी बच्चे अव्यक्त रूप में स्थित हो किसको देख रहे होव्यक्त रूप में या अव्यक्त रूप मेंआप व्यक्त हो या अव्यक्तअगर व्यक्त में देखेंगे तो बाप को नहीं देख सकेंगे। आज अव्यक्त वतन से मुलाकात करने आया हूँ। अव्यक्त वतन में आवाज नहीं परन्तु यहाँ आवाज में आया हूँ। आप सभी बच्चों के अन्दर में कौन-सा संकल्प चल रहा हैअभी यह अव्यक्त मुलाकात है। जैसे कल्प पहले मिसल बच्चों से रूहरूहान चल रही है। रूह-रूहान करने मीठे-मीठे बाबा ने आप सभी बच्चों से मिलने भेजा है। जो थे वह अब भी हैं। दो तीन दिन पहले मीठे-मीठे बाबा से रूह-रूहान चल रही थी। रूह-रूहान क्या हैमालूम हैबाबा ने बोलावतन का अनुभव करने के लिए तैयार होक्या जवाब दिया होगायही कहा कि जो बाप की आज्ञा। जैसे चलायेंगेजहाँ बिठायेंगे जिस रूप में बिठायेंगे। बच्चों के अन्दर यही संकल्प होगा कि बापदादा ने छुट्टी क्यों नहीं लीबाबा को भी यह कहा। बाबा ने कहा अगर सभी बच्चों को बिठाकर छुट्टी दिलाऊँ तो छुट्टी देंगेआप भी बच्चों को देखसर्विस को देख बच्चों के स्नेह में आ जायेंगे। इसलिए जो बाप ने कराया वही ड्रामा की भावी कहेंगे। व्यक्त रूप में नहींतो अव्यक्त रूप से मुलाकात कर ही रहे हैं। सर्विस की वृद्धि वैसे ही हैबच्चों की याद वैसे ही है लेकिन अन्तर यह है कि वह व्यक्त में अव्यक्त था और यह अव्यक्त ही है। जो नयनों की मुलाकात जानते होंगे वह नयनों से इस थोड़ी सी मुलाकात में अपने प्रति शिक्षा डायरेक्शन ले लेंगे। आप सभी को वतन में तो आना ही है। बच्चों से मुला- कात करने के लिए हर वक्तहर समय तैयार ही रहते हैं। अब जहाँ तक बच्चों की जितनी बुद्धि क्लीयर होगीउसी अनुसार ही अव्यक्त मिलन का अनुभव कर सकेंगे। शक्ति स्वरूप में स्थित हैं? (दीदी से) जैसे साथ थे वैसे ही हैं। अलग नहीं। अभी शक्ति स्वरूप का पार्ट प्रत्यक्ष में दिखाना है। जो बाप की शिक्षा मिली हैवह प्रैक्टिकल में करके दिखाना है। शक्ति सेना बहुत हैअभी पूरा शक्ति स्वरूप बन जाना। अभी तक बच्चे और बाप के स्नेह में चलते रहे। अब फिर बाप से जो शक्ति मिली है उस शक्ति से औरों को ऐसा शक्तिवान् बनाना है। वही बाप के स्नेही बाप के साथ अन्त तक रहेंगे। अभी मीठे-मीठे बाबा दृश्य दिखला रहे हैं - आप सभी बच्चों का। आप अस्थियाँ उठा रहे थे। अस्थियों को नहीं देखना स्थिति को देखना। यह अस्थियाँ स्थिति स्वरूप हैं। एक एक रग में स्थिति थी। तो बाहर से वह अस्थियों को रखा है। परन्तु इसका अर्थ भक्ति मार्ग का नहीं उठाना। इन अस्थियों में जो स्थिति भरी हुई हैहमेशा उसको देखना है। साधारण मनुष्यों को यह बातें इतना समझ में नहीं आयेगी। बच्चों का स्नेह है और सदा रहेगा21 जन्म तक रहेगा। आप सभी सतयुगी दुनिया में साथ नहीं चलेंगेराज्य साथ नहीं पायेंगेसाथ ही हैंसाथ ही रहेंगे-जन्म जन्मान्तर तक। अभी भी ऐसा नहीं समझनाबाप है दादा नहीं या दादा है तो बाप नहीं। हम दोनों एक दो से एक पल भी अलग नहीं हो सकते। ऐसे ही आप अपने को त्रिमूर्ति ही समझो। इसीलिए कहते हैं त्रिमूर्ति का बैज हमेशा साथ रखो। जब ब्रह्माविष्णु और शंकर तीन को देखते हो तो आपके भी त्रिमूर्ति की याद अर्थात् अपना स्वरूप और बापदादा की यादत्रिमूर्ति की स्थिति मशहूर है। इसमें ही आप सभी बच्चों का कल्याण है। कल्याणकारी बाप जो कहते हैंजो कराते हैंउसमें ही कल्याण है। इसमें एक एक महावाक्य मेंएक-एक नजर में बहुत कल्याण है। लेकिन स्थूल को परखने वाले कोई कोई अनन्य और महारथी बच्चे हैं। अब आप भी इतना ही शीघ्र कर्मातीत स्थिति में स्थित रहने का पुरुषार्थ करो। जैसे यहाँ हर समय बापदादा के साथ व्यतीत करते थे वैसे ही हर कर्म मेंहर समय अपने को साथ ही रखा करो। बच्चेयही शिक्षा याद रखनाकभी नहीं भूलना। सम्बन्धस्नेहस्मृति स्वरूपसाथ-साथ सरलता स्वरूपसमर्पण और एक दो के सहयोगी बन सफलता को पाते रहना। सफलता आप सभी बच्चों के मस्तक के बीच चमक रही है। अब बहुत समय हुआ है और कुछ कहना हैसूक्ष्मवतन में बैठे भी हर बच्चे की दिनचर्याहर बच्चे का चार्ट सामने रहता है। व्यक्त रूप से अभी तो और ही स्पष्ट रूप से देखते हैं। इसलिए सभी की रिजल्ट देखते रहते हैं।
जितना अव्यक्त स्थिति में स्थित होंगे उतना उस अव्यक्त स्थिति से कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्म ऐसा होगा जैसे श्रीमत राय दे रही है। यह अनुभव बच्चे पायेंगे। अब अपनी अव्यक्त स्थिति के आधार से ऐसा काम करनाजैसे श्रीमत के आधार से हर काम होता रहा है। जिस चीज के साथ बाप का स्नेह है उससे उतना स्नेह रखना ही अपने को सौभाग्यशाली बनाना है। रग-रग में किस के साथ स्नेह था5 तत्वों से नहीं। स्नेह गुणों से ही होता है। स्नेह थानहीं। है और रहेगा। जब तक भविष्य नई दुनिया न बनी है तब तक यह अटूट स्नेह रहेगा। स्नेह आत्मा के साथ और कर्तव्य के साथ ही है तो फिर शरीर क्या! अन्त तक साथी रहेंगे। जिसका बाप के साथ स्नेह है वही अन्त तक स्थापना के कार्य में मददगार रहेंगे। इसलिए स्नेही होने की कोशिश करो। कैसी भी माया आवेमायाजीत बनना। जैसे बैज लगाते हो वैसे मस्तक पर यह विजय का बैज लगाओ।
मधुबन का नक्शा सारे वर्ल्ड के सामने म्युजियम के रूप में होना चाहिए। अविनाशी भण्डारा है इसका और भी ज्यादा शो करना है। जैसे सभी बच्चे पत्र लिखते थे वैसे ही लिखते रहना। जैसे डायरेक्शन लेते थे वैसे ही लेना। शरीर की बात दूसरी है। सर्विस वही है। इसलिए जो भी बात हो मधुबन में लिखते रहना। अपना पूरा कनेक्शन रखना। दूसरों को भी अपनी अवस्था का सबूत देना। आपको देख और भी ऐसे करेंगे।
(विदाई के समय)
यह तो आप बच्चे जानते हो कि जो भी ड्रामा का पार्ट है इसमें कोई गुप्त रहस्य भरा हुआ है। क्या रहस्य भरा हुआ है वह समय प्रति समय सुनाते जायेंगे। अब तो आपका वही यादगार जो आकाश में हैदुनिया वाले इन आँखों से देखेंगे कि यह धरती के सितारे किसकी श्रीमत से चल रहे हैं। बाबा ने कहा है - ज्यादा समय वहाँ नहीं बैठना।